भारतवासी जब तक अपने स्वभाव में नहीं आएंगे, तब तक प्राप्त नहीं होगी सच्ची स्वतंत्रता -आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा

शान्त-क्रांति संघ में पर्यूषण पर्व का दूसरा दिन

रतलाम,15 अगस्त। स्वभाव में जीना स्वतंत्रता है और विभाव में जीना परतंत्रता। 15 अगस्त को भारत को भले ही आजादी मिली, लेकिन वह केवल भौगोलिक स्वतंत्रता थी। भारतवासी जब तक अपने स्वभाव में नहीं आएंगे, तब तक सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती। सच्ची स्वतंत्रता तो सिद्ध, बुद्ध, मुक्त होने पर मिलती है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। छोटू भाई की बगीची में पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन आचार्यश्री ने स्वतंत्रता दिवस के विशेष प्रवचन में कहा कि मन का स्वभाव शांति है, जबकि बुद्धि का स्वभाव निर्मलता है। आत्मा का स्वभाव आनंद है। इसके विपरीत अशांति मन का विभाव होती है। मलीनता से बुद्धि का और अवसाद से आत्मा का विभाव है। स्वभाव जहां भी है, वहां स्वतंत्रता है। अंग्रेजों की परतंत्रता से भले ही भारतवासी स्वतंत्र हो गए है, लकिन अंग्रेजियत जब तक नहीं जाएगी, तब तक सच्ची स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।
आचार्यश्री ने कहा कि पर्यूषण महापर्व हमे सच्ची स्वतंत्रता की प्रेरणा देने आते है। इनमें हमे मन की स्वाभाविकता को प्राप्त करना चाहिए। शांति, निर्मलता और आनंद हमारा स्वभाव है और यही स्वभाव हमे सर्वतंत्र एवं स्वतंत्र बनाता है। इस स्वभाव को प्रकट करने वाले साधक ही परम साधक बनते है। भारत आर्य भूमि है और यहां के निवासी आर्य पुरूषों की संगति में रहते है। आर्य पुरूषांे ने शुद्धि एवं सिद्धी का जो मार्ग बतलाया है, उस पर चलकर हम स्वतंत्र हो सकते है। स्वतंत्रता जीव का जन्म सिद्ध अधिकार है, उसे बाहर से नहीं भीतर से प्रकट करना सच्ची स्वतंत्रता है।
प्रवचन के आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने महालक्ष्मी की प्राप्ति के पांच उपाय-संत दर्शन, सुपात्र दान, जीवदया, साधर्मी सेवा और मानवता की सुरक्षा बताए। विद्वान संत श्री रत्नेशमुनिजी मसा ने आगम का वाचन किया। महासती कनकश्री जी मसा ने भी संबोधित किया। इस मौके पर दिल्ली से आई संतोष जैन ने आचार्यश्री से आगामी चातुर्मास दिल्ली में करने की विनती की। महासती श्री मोहकप्रभाश्री जी मसा ने 12 उपवास एवं सुनीता बोहरा ने 18 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। सैकडों श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास के संकल्प ग्रहण किए।