पर्यूषण महापर्व के पांचवे दिन नारी तू नारायणी पर प्रवचन
रतलाम,18 अगस्त। यत्र नारी पूजयंते, तत्र रमन्ते देवता, भारतीय संस्कृति का यह संदेश सर्व कल्याणकारी है। किसी भी परिवार और समाज नर और नारी दो धुरिया होती है। नारी की परिवार और समाज के साथ ही राष्ट्र के निर्मार्ण में भी बहुत बडी भूमिका होती है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। पर्यूषण महापर्व के पांचवे दिन छोटू भाई की बगीची में नारी तू नारायणी है, विषय पर प्रवचन देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे शरीर में नाडी का महत्व है, वैसे ही परिवार में नारी का विशिष्ट महत्व है। शरीर में नाडी बंद होते ही उसे शमशाम को सौंप दिया जाता है। इसी प्रकार यदि परिवार में नारी ना रहे, तो वह परिवार, परिवार नहीं रहता।
आचार्यश्री ने कहा कि किसी भी लडकी का भविष्य सिर्फ शादी नहीं है। संस्कार युक्त शिक्षा ही उसका उज्जवल भविष्य है। लडकी दो कुलों में उजाला करती है। घर के बाद ससुराल में लडकी संस्कारित होती है, तो पूरे परिवार का संस्कारवान बनाती है। परिवार से समाज और समाज से ही राष्ट्र का निर्माण होता है। इसलिए नारी का संस्कारित होना जरूरी है। नारी अपने सत्य और शील से नारायणी बनती है। यदि नारी जागरूक हो, तो पूरा परिवार, समाज और राष्ट्र प्रगति करेगा।
आचार्यश्री ने साधु और साध्वी को समान रूप से सम्मान देने का आव्हान करते हुए कहा कि जो साधु-साध्वी में भेद करता है, वह जिनशासन के प्रति नहीं अपितु व्यक्ति के प्रति अनुराग रखता है। नारी के प्रति कभी दीनता, हीनता और मलीनता का भाव नहीं लाना चाहिए। नारी नारायणी है, क्योंकि वह ना केवल हमे जगाती है, वरन भव से पार लगाने वाली बहुत बडी शक्ति होती है।
उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने इससे पूर्व आचारण सूत्र का वाचन किया। उन्होंने कहा कि कडवी गोली और मीठी गोली में व्यक्ति मीठी को चूसता है और कडवी फैंक देता है, लेकिन समाज जीवन में काम, क्रोध, लोभ, मोह, माया आदि के कडवापन को पसंद करता है और आत्म कल्याण के मीठेपन से दूर रहता है। जीवन को सार्थक करना है, तो धर्म-ध्यान, तप-त्याग और तपस्या को आचरण में लाओ। आरंभ में विद्वान संत श्री रत्नेशमुनिजी मसा ने आगम का वाचन किया। इस दौरान सैकडों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।