चातुर्मासिक प्रवचन में दी संतोषी सदा सुखी की सीख
रतलाम,29 अगस्त। परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने मंगलवार के चातुर्मासिक प्रवचन में संतोषी सदा सुखी की सीख दी। उन्होंने कहा कि संसार असंतुष्टों से भरा हुआ है। असंतोष की आग बहुत फैली हुई है। इसमें बहुत सारे लोग झुलस रहे है, लेकिन सबके साथ जिदंगी भर बटोरा, तो भी अंत में खाली कटोरा ही रहने वाला है। संतोष सन्मति का दूसरा गुण है, इसे धारण करने वाला कभी दुखी नहीं रहता।
छोटू भाई की बगीची में प्रवचन देते हुए आचार्य प्रवर ने कहा कि प्राप्त को पर्याप्त मानना चाहिए, लेकिन मनुष्य प्राप्त को अपर्याप्त मानता है और जिदंगी भर प्राप्ति के संघर्ष में लगा रहता है। संघर्ष से मन अशांत होता है और उससे बुद्धि में विकार पैदा होते है। प्राप्त को पर्याप्त मानकर संतोष का भाव रखने वाला सदैव सुखी रहता है। संसार में जो भी प्राप्त है, वह अपने पुण्य की बदौलत मिला है, ऐसी सोच ही संतोष लाती हैं। इसके लिए हर व्यक्ति को दुनिया के बजाए अपनी चिंता करनी होगी।
आचार्यश्री ने कहा कि संतोष जहां होता है, वहां शांति और संतुलन का वास रहता है और व्यक्ति अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल होता है। सन्मति सदगति का आधार होती है, इसलिए सन्मति में जीना चाहिए। संतोष में जीने वाले का भोजन भी भजन बन जाता है, जबकि इच्छा रखने वाला सदैव भटकता रहता है। इच्छा रखकर मरने पर मृत्यु होती है, लेकिन इच्छामुक्त होकर मरने पर मुक्ति मिलती है। मृत्यु वाला इंसान जन्म-मरण के चक्रव्यूह में उलझा रहता है। मुक्ति चाहिए तो जीवन में संतोष आवश्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि जैसे आकाश अनंत है, वैसे ही इच्छाएं भी अनंत होती है। व्यक्ति को अर्थ का अभाव भी दुखी करता है और अर्थ का प्रभाव भी दुखी ही रखता है। इसलिए प्राप्त को पर्याप्त मानो और संतोष के साथ रहो। इससे जीवन सार्थक हो जाएगा। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी मसा ने आचारण सूत्र का वाचन किया। आचार्यश्री से सुश्रावक संजय मेहता ने 11 वें दिन 14 चोविहार उपवास के प्रत्याख्यान लिए। महासती मोहकप्रभाजी मसा ने 26 एवं महासती चिंतनप्रज्ञाजी मसा ने 9 उपवास की तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। अन्य तपस्वियों ने भी बेले, तेले और अन्य तपस्या का संकल्प लिया। इस दौरान सैकडों श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।