चिंता मुक्त सुखी जीवन – गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा.

रतलाम। श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक पर पर्युषण महापर्व पर प्रवचनकार पूज्य गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि निराशा चिंता की माता व भय चिंता का पिता है। निराशा और भय चिंता को पैदा करते है । लखनऊ के रेलवे स्टेशन पर लिखा हुआ है यह लखनऊ है आप मुस्कुराइये। किसी भी अनजान व्यक्ति से चाहे वो कोई सी भी भाषा समझता हो उससे हमारा प्रथम परिचय मुस्कान के द्वारा ही होता है। एक नवजात शिशु जो की बोल नही सकता है, उसे देखकर हम मुस्कुराते है तो वो भी हमें देखकर मुस्कुराता है। इसलिये मुस्कान की प्रथम परिचय है। फूलों को खिलता मुस्कुराता हुआ देखकर हम समझ जाते है की इसे अनुकूल खाद पानी मिला है, इसी तरह मनुष्य के चेहरे पर खिली हुई मुस्कान यह संकेत देती है की आप अपने वर्तमान जीवन से संतुष्ट है और भविष्य के प्रति आशावान है। भविष्य के प्रति हमारे प्रति कितनी उत्कंठा है, उत्सुकता है यह हमारे चेहरे पर झलक जाती है। प्रसन्नतायुक्त चेहरे को देखकर ही हम खुश होते है, रोती सूरत किसी को भी अच्छी नही लगती है । सन्तजन कहते है कि जिस मनुष्य के ह्दय में चिंता परेशानी होती है वह मुस्कुरा नही सकता है। सूरज की रोशनी के आगे बादल आ जाने से जैसे सूरज का प्रकाश फीका पड़ जाता है, वैसे ही मनुष्य चिंता की लकीरें आने से उसका व्यक्तित्व फीका पड़ जाता है । चिंता की वजह से शरीर कृष हो जाता है, चिंता मनुष्य के चेहरे को मनहूस बना देती है। चिंता और चिता समान है, क्योंकि चिंता मुर्दे को जलाती है और चिंता जीवित व्यक्ति को अंदर ही अंदर जलाती है। जैसे ठोस लकड़ी को भी घुन धीरे धीरे समाप्त कर देती है, वैसे ही चिंता मनुष्य को धीरे धीरे समाप्त कर देती है। जीवन है तो इसमें विपरीत परिस्थियां, प्रतिकूलता तो आएगी ही लेकिन ऐसी परिस्थितियों में भी मन को मजबूत करके निराशा और भय को भगाया जा सकता है, और जँहा निराशा नही भय नही वँहा चिंता आ ही नही सकती है। सबसे बड़ा रोग क्या कहेंगे लोग, व्यक्ति पाप करने से नही डरता है, पाप प्रकट न हो जाए इस बात से डरता है। इसलिये शुध्द साधना में लगा हुआ व्यक्ति, प्रामाणिकता से जीने वाला व्यक्ति कभी चिंतित नही होता है । जैसा देंगे वो ही लौटकर आएगा। दुसरो को हँसाओगे तो स्वंय को प्रसन्नता मिलेगी। दूसरे की हँसी उड़ाओगे तो एक न एक दिन खुद हँसी के पात्र बनोगे। दूसरों को प्रसन्न रखने की सुख देने की भावना रखने वाला जीवन ही सर्वश्रेष्ठ जीवन है।