ग्रंथ, गंगा, गाय और गोपियों के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकते- आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

पवित्र ग्रंथ पूजा कर आचार्य श्री को किए भेट

रतलाम, 15 सितंबर। साधु जीवन में कलर की, कालर की, जेब की, सिलाई की जरूरत नहीं है। इन सब की कीमत कुछ भी नहीं है, फिर भी उनके कपड़े का मूल्य बहुत है। इसके विपरीत मनुष्य भव में कपड़े का कलर, उसमें जेब, कालर, सिलाई का बहुत महत्व है लेकिन मनुष्य का कोई मूल्य नहीं है। इंसान इसलिए सुखी नहीं है क्योकि उसकी पेंट में जेब है। जेब भरी होने पर खाली न हो जाने और खाली होने पर भरने की चिंता उसे सताती रहती है।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने पर्यूषण महापर्व के दौरान सैलाना वालों की हवेली मोहन टॉकीज में कही। आचार्य श्री ने कहा कि साधु के कपड़ों की कोई कीमत नहीं है लेकिन उसका मूल्य है। इसके विपरीत मनुष्य के कपड़ों की कीमत है लेकिन उसका कोई मूल्य नहीं है। प्रवचन से पूर्व ग्रंथ पूजा की गई। इसके बाद पवित्र ग्रंथ आचार्य श्री को सौंपे गए। इसके बाद श्री कल्पसूत्र ग्रंथ का वाचन आचार्य श्री ने किया।
आचार्य श्री ने कहा कि ग्रंथ, गंगा, गाय और गोपियों के बिना भारतीय संस्कृति की कल्पना हम नहीं कर सकते है। कोई भी सीख हमें ग्रंथ संहिता से मिलती है। गंगा आज दूषित हो रही है, हमें उसे बचाने के प्रयास करने होंगे। गाय का कत्ल हो रहा है, हमें उसे बचाना है। गोपियों से तात्पर्य नारी से है, जिनका सम्मान करना हम भूल गए है। जब तक हम इन चारों को नहीं बचाएंगे तब तक हम भारतीय संस्कृति की कल्पना नहीं कर सकते है।
आचार्य श्री ने कहा कि पर्यूषण पर्व के दौरान हमे बाहर से हटकर जीवन के अंदर उतरना है। हमे अपनी सभी प्रवृत्तियों को छोड़ना है, जो भीतर में गया है, वह तर गया है। हम सारी दुनिया में घूमकर आए लेकिन आत्मा को नहीं देखा। बिना आचार के जीवन की कोई कीमत नहीं है। ठीक वैसे ही जैसे कि बिना सिम का मोबाइल, बिना सेल की घड़ी की कोई कीमत नहीं होती है। आज विचारों की बात है, आचारों की नहीं है।
इस अवसर पर श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय एवं श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी के साथ श्री संघ के पदाधिकारी, सदस्य एवं बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।