
रतलाम । श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ नीमचौक पर पर्युषण महापर्व पर प्रवचनकार पूज्य गुरुदेव श्री अरुणमुनि जी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि भगवान की भक्ति प्रत्येक व्यक्ति अपने अपने धर्म के अनुसार करते ही है और कहते है भगवान की भक्ति से सब मनोरथ पूर्ण होते है, लेकिन उसके बावजूद भक्ति का फल क्यों नही मिलता है। क्योंकि भक्ति में धैर्य, श्रद्धा, और विश्वास की कमी होती है।
भक्ति में बहुत शक्ति होती है, अगर पूर्वकृत कर्मों की वजह से कोई विपत्ति आती भी है तो भक्ति के प्रभाव से वो विपत्ति जल्दी टल जाती है। लेकिन ईश्वर के प्रति जो समर्पण भाव हमारे भीतर होना चाहिए वो हममें होता नही है, भक्ति के भाव हमारे मन में आ नही पाते है, भक्ति के वक्त भी हमारा मन चारों दिशाओं में घूम रहा होता है।
प्रभु की भक्ति निष्काम होना चाहिए, कोई आशा अभिलाषा, चाहत नही होना होना चाहिए, क्योंकि जैसे जैसे भक्ति सुदृढ होगी वैसे वैसे अपने आप जीवन में सफलता मिलती जाएगी।
भक्त जब साधना करने के लिये तैयार होता है तब अनन्त धैर्य रखना जरूरी होता है, साधना में अनेक प्रकार की परीक्षाएं उपसर्ग, विपरीत परिस्थितियां आती है । साधना को फलीभूत होने में काफी समय लग सकता है, लेकिन उस लगने वाले समय में आस्था को डिगाना नही चाहिए।
एक वृद्ध तपस्वी बहुत कठोर साधना कर रहा था, पूरा जीवन हो गया उसे साधना करते करते, नारद जी जब पृथ्वी लोक पर भृमण के लिये निकले तो उस तपस्वी की साधना देखकर रुके और तपस्वी से कहा की तुम्हे भगवान से कुछ पूछना हो तो बताओ में पूछ लूँगा, तपस्वी ने कहा की आप तो बस इतना पूछकर बता देना की मुझे मोक्ष कब मिलेगा।
आगे चलकर नारद जी को एक युवा तपस्वी मिला उससे भी नारद जी ने यही कहा, तो युवा तपस्वी में कहा मैने तो अभी साधना शुरू ही की है अभी तो मुझे बहुत साधना करना है, फिर भी आप पूछना चाहे तो बस इतना पूछ लेना की मुझे मोक्ष कब मिलेगा। नारदजी ने ब्रह्मलोक में पंहुचकर ब्रह्मा जी से दोनों तपस्वियों के सवाल पूछे और ब्रह्मा जी ने जवाब दिया।
फिर नारदजी पृथ्वीलोक पर आए और वृद्ध तपस्वी से कहा की ब्रह्माजी ने बताया की बहुत जल्द यानि की अगले 3 भव के बाद आपको मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी, लेकिन तब तक आपको साधना में अडिग रहना होगा। ये सुनकर वो तपस्वी क्रोधित हो गया और कहने लगा की इतने वर्षों तक साधना की और अब और 3 जन्मों तक साधना करना पड़ेगी, नही करनी मुझे ऐसी साधना। और उसने साधना का मार्ग छोड़ दिया। और भव भव की भटकन में फिर से उलझ गया।
फिर नारदजी युवा तपस्वी के पास गए और उससे कहा की अभी तुम्हारा मोक्ष बहुत दूर है, जिस इमली के पेड़ के नीचे तुम साधना कर रहे हो उस पेड़ पर जितने पत्ते है उतने भव तक तुझे साधना करना होगी तब तुझे मोक्ष मिलेगा। यह सुनते वह युवा तपस्वी खुशी से झूम उठा और कहने लगा प्रभु कितने दयालु है इस दुनिया में कितने इमली के पेड़ है कितने सारे असंख्य पत्ते होंगे मुझे तो केवल इस एक पेड़ पर जितने पत्ते है उतने भवों के बाद मोक्ष मिलने वाला है, और यह कहकर वो फिर से अपनी साधना में लीन हो गया । और कुछ जन्मों के बाद वो मोक्ष का अधिकारी हो गया।
इसलिये कहा जाता है की भक्ति और साधना में अगर धैर्य रखोगे तो फल निश्चित मिलेगा, प्रभु अवश्य मिलेंगे।