सिर्फ दुःख में कहते है “ओह गाड वाय मी” सुख में क्यों नहीं – मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा.

सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में विशेष प्रवचन

रतलाम, 8 अक्टूबर। उदय और अस्त का योग यानी सूर्य, वृद्धि और क्षय का योग यानी चंद्र, बसंत और पतझड़ का योग यानी वृक्ष, ठीक उसी तरह… सुख और दु:ख का योग मानव जीवन है। जब हमारे जीवन में दुःख आते हैं तब हम प्रभु से शिकायत करते हैं कि ” ओह गॉड वाय मी ” लेकिन सुख में हम उनसे यह कभी नहीं कहते।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. की निश्रा में शिष्य मुनिराज ज्ञानबोधी विजयजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाकीज में “ओह गाड वाय मी” विषय पर आयोजित विशेष प्रवचन में कही। मुनिराज ने कहा कि कर्म की दुनिया में सीधा हिसाब है कि वह किसी को नहीं छोड़ता है। कर्म के पास न कागज है, न किताब, फिर भी सब का हिसाब है।
मुनिराज ने कहा कि हर व्यक्ति की शिकायत होती है, मैंने सबका अच्छा किया, तो मेरे साथ बुरा क्यों हुआ ? लेकिन जो कुछ होता है, उसके पीछे कोई ना कोई कारण जरूर होता है। जीवन में सुख और दुख दोनों स्वीकार करना चाहिए। हम सुख में कभी भगवान को याद नहीं करते है लेकिन दुःख में यह कहते हैं कि “ओह गाड वाय मी” यह मेरे साथ ही क्यों हुआ।
मुनिराज ने कहा कि दु:ख किसी को पसंद नहीं और सुख सबको पसंद है, लेकिन यह सब कर्मों पर निर्भर करता है। आपको क्या चाहिए, यह आपको तय करना है। कर्मों का फल तत्काल नहीं लेकिन समय आने पर ज़रूर मिलता है। यदि स्वयं को सुख चाहिए तो दूसरों को सुख दीजिए, क्यों कि जो दोगे वही तो मिलेगा। यह दुनिया का नियम है।
प्रवचन के आरम्भ में मुंबई के संगीतकार जैनम वारैया ने सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।
आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. की 16 दिन की सुरिमंत्र की साधना 11 अक्टूबर को पूरी होगी। सूरिमंत्र की अखंड साधना पूर्ण होने के अवसर पर बुधवार को प्रातः 8.30 बजे महामांगलिक का आयोजन होगा। श्री संघ ने इसमें अधिक से अधिक संख्या में धर्मालुजनों से उपस्थित रहने का आह्वान किया है।