महान बनकर साधारण रहना असाधारण बात -आचार्य प्रवर श्री विजयराजजी मसा

छोटू भाई की बगीची में प्रवचन

रतलाम,09 अक्टूबर । महान बनना साधारण बात है, लेकिन महान बनकर साधारण रहना असाधारण बात होती है। पद, पैसा, प्रतिष्ठा और मान-सम्मान का जिसे गुरूर नहीं होता, वहीं महान बनकर साधारण रह सकता है। महापुरूषों की असाधारणता का यही परिचायक है।
यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने प्रवचन में कही। छोटू भाई की बगीची में उपस्थित धर्मालुजनों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि महान बनने का लक्ष्य प्रयासों से पूरा हो सकता है, लेकिन महान बनने के साथ-साध साधारण बने रहना है, तो अपने आप का अवलोकन करना चाहिए। संसार का अवलोकन तो आंख से होता है, लेकिन अपने जीवन का अवलोकन ज्ञान से होता है। ज्ञान से जीवन का अवलोकन करने वाले ही महान बनते है।
आचार्यश्री ने कहा कि दुनिया का बनकर देख चुके, इसलिए अब खुद का बनकर देखो। संसार में भले ही करोडपति हो, लेकिन वह आनंद नहीं है, जो संयम में होता है। यद्धपि साधु होने के नाते उन्होंने संसार देखा नहीं है, लेकिन संसारियों के किस्से सुन-सुनकर अपने अनुभव के आधार पर वे कह सकते है कि संसार दुखांे का सागर है और सुख संयम ही देता है। इस सुख के लिए श्रद्धा और विश्वास जरूरी है। भगवान की वाणी पर यदि भरोसा है, तो कहीं भटकने की जरूरत नही है। अपनी श्रद्धा का बल मजबूत करो। संसार में जो हाय-हाय, लाय-लाय और त्राय-त्राय मची है, उससे खुद को श्रद्धा एवं विश्वास रखकर ही बचाया जा सकता है। श्रद्धा एवं विश्वास से ज्ञान, दर्शन और चारित्र का मार्ग प्रशस्त होता है।
आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेशमुनिजी मसा ने संतोष से जीवन जीने पर बल दिया। उन्होंने संतोष के दृष्टिकोण और उससे मिलने वाले लाभों पर प्रकाश डाला। महासती श्री इन्दुप्रभाजी मसा ने इस मौके पर 21 उपवास के प्रत्याख्यान लिए। अन्य लोगों ने भी तपस्या के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। इस दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।