भोग के रिश्तों को मरने से पहले श्रद्धा का रिश्ता बना लो जीवन सुधर जाएगा-समकितमुनिजी

  • नारी को पुरूष जैसा बनने की जरूरत नहीं अपने मूल गुण कायम रखें
  • आदिनाथ सोसायटी स्थानक प्रांगण में श्रीपाल-मैनासुंदरी चरित्र का वाचन

पूना, 23 अक्टूबर। श्रीपाल व मैनासुंदरी की तरह वह दंपति सौभाग्यशाली होते है जिनके भोगमय जीवन से धर्म का जन्म होता है। वासना के जीवन से आस्था का जीवन निकलता है। अपने रिश्तों को ऐसा बना लो कि बहुत जी लिए भोग के अंदर अब तो योग व उपासना में जीवन लगाने का समय आया। भोग के रिश्तों को मरने से पहले श्रद्धा का रिश्ता बना लो। भोग का जीवन जीते हुए तीस, चालीस, पचास वर्ष हो गए अब तो इनसे मुक्ति प्राप्त करो। दादा-दादी बनने के बाद सात्विक जीवन जीने के लिए आगे बढ़ना चाहिए। ये विचार पुण्यनगरी पूना के आदिनाथ सोसायटी जैन स्थानक भवन ट्रस्ट के तत्वावधान में श्रमणसंघीय सलाहकार सुमतिप्रकाशजी म.सा. के सुशिष्य आगमज्ञाता प्रज्ञामहर्षि डॉ. समकितमुनिजी म.सा. ने सोमवार को नवपद ओलीजी आराधना के तहत श्रीपाल मैनासुंदरी चरित्र का वाचन करने के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि किस तरह राजा प्रजापाल अपनी पुत्री मैनासुंदरी की बात से नाराज होकर उसकी शादी कोढ़ियों के दल के सरदार श्रीपाल से कर देता है। शादी के बाद कोढ़ियो का दल आगे बढ़ जाता है। श्रीपाल मैना से कहता है मेरे पास देने के लिए रोग के अलावा कुछ नहीं है तुम जहां चाहे जा सकती हो। मैना कहती एक बार दिल से स्वीकार कर लिया अब कोई ओर नहीं बस सकता, जीना-मरना आपके साथ है। दुःख में साथ देने वाला कोई मिल जाए तो आधा दुःख वैसे ही समाप्त हो जाता है। फूल भी चुभने लग जाते है अगर कोई साथ देने वाला नहीं मिलता है। सूर्योदय श्रीपाल के भाग्य का उदय लेकर आता है। कोढ़ियों का काफिला आगे बढ़ता है तो मार्ग में मैना को संत नजर आते है। वह श्रीपाल को साथ लेकर उनके पास जाकर वंदना करती है। गुरू मैना को नवपद आयम्बिल करने की साधना बताते है मैना सोचती है जीवन में स्थिरता नहीं है साधना कैसे करूंगी। गुरू वहां दर्शन के लिए आए एक स्वधर्मी भाई को नवपद आयम्बिल के लिए अपने घर ले जाने की प्रेरणा देते है। श्रीपाल कहता है जाएंगे तो हम दो नहीं बल्कि पूरे दल के 702 सदस्य जाएंगे। स्वधर्मी भाई इसके लिए भी तैयार हो जाता है। नवपद आराधना के बाद श्रीपाल सहित दल में शामिल सभी कोढ़ियों का कुष्ट रोग समाप्त हो जाता है ओर श्रीपाल मैना को साथ लेकर उस दल से विदाई लेते है। समकितमुनिजी ने कहा कि मैनासुंदरी का चरित्र आज की बेटियों के लिए प्रेरणादायी है ओर उन्हें अवश्य इसे सुनाना चाहिए। ये चरित्र बताता है कि नारी के क्या गुण होते है ओर नारी को कभी अपनी विशिष्टता व गुण का त्याग नहीं करना चाहिए। जब पुरूष नारी जैसा नहीं बनना चाहता तो नारी को भी पुरूष जैसा बनने की होड़ नहीं करनी चाहिए। मुनिश्री ने कहा कि वह नारी की उच्च पढ़ाई या कॅरियर बनाने के खिलाफ नहीं है पर जिस नारी को परिवार बनाने व संवारने की कला नहीं आई फिर वह भले कितने बड़े ओहदे पर हो क्या काम आएगी। उन्होंने कहा कि अजीब है रिश्ते जो दिखने में बहुत मजबूत लगते है पर जरा सी भूल से यह रिश्ते बहुत जल्दी टूट जाते है। दुनिया की फितरत है सुख में सब साथ चलेंगे दुःख में मुख मोड़ेंगे। अपना बनकर अपनों का ही दिल तोड़ते है, भगवान को धोखा देने वाले इंसान को क्या छोड़ेंगे। उन्होंने कहा कि मैना की शादी कोढ़ी श्रीपाल के साथ करा दी जाती है तो भी वह प्रसन्नता से उसे स्वीकार कर लेती है ओर विदाई के समय पिता से यहीं कहती है कि आशीर्वाद दे कि जो मिला उसे संभाल ओर संवार सकू। ये प्रसंग शिक्षा देता है कि मायके से जो मिले उसे प्रसन्नता के साथ स्वीकार कर आगे बढ़े चाहे वह हमे पसंद आए या न आए। उसमें मीनमेख नहीं निकालना चाहिए। प्रवचन के शुरू में गायनकुशल जयवंतमुनिजी म.सा. ने प्रेरणादायी भजन ‘‘जो दुखियों को खुशहाल करे ऐसा व्यापारी आया है’’ की प्रस्तुति दी। धर्मसभा में पूज्य प्रेरणाकुशल भवान्तमुनिजी म.सा., सरलमना विजयमुनिजी म.सा., सेवाभावी श्री भूषणमुनिजी म.सा. का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। धर्मसभा का संचालन एवं अतिथियों का स्वागत आदिनाथ स्थानकवासी जैन भवन ट्रस्ट पूना के अध्यक्ष सचिन रमेशचन्द्र टाटीया ने किया। धर्मसभा में सुश्रावक संतोषकुमार कोठारी ने हर्ष-हर्ष के जयकारों के बीच पूज्य समकितमुनिजी म.सा. के मुखारबिंद से 9 उपवास के प्रत्याख्यान ग्रहण किए। उनका श्री आदिनाथ संघ द्वारा भी सम्मान किया गया। कई श्रावक-श्राविकाओं ने आयम्बिल, एकासन आदि तप के प्रत्याख्यान भी लिए। धर्मसभा में पूना व आसपास के विभिन्न क्षेत्रों से पधारे श्रावक-श्राविकाएं बड़ी संख्या में मौजूद थे।
नवपद ओली की आराधना से दूर हो जाते काया के सारे रोग
समकितमुनिजी ने बताया कि किस तरह मैनासुंदरी नवपद आराधना करती है जिससे श्रीपाल का कोढ़ रोग भी समाप्त हो जाता है। पहले दिन पहले पद णमो अरिहताणं की सफेद रंग की आराधना श्रीपाल के शरीर के सारे संक्रमण को रोक देती है। बिना संक्रमण समाप्ति के शरीर का रोग समाप्त नहीं हो सकता। दूसरे दिन दूसरे पद णमो सिद्धाणं के साथ लाल रंग की आराधना से रोग की जड़ बिल्कुल जल जाती है। तीसरे दिन तीसरे पद णमो आयरियाणं की पीले रंग की साधना से जख्म धीरे-धीरे भरने लगते है। चौथे दिन णमो उवज्जझयाणं की हरे रंग की साधना से जख्म भरने के साथ नई चमड़ी आने लगती है। पांचवें दिन पांचवे पद णमो लोए सव्वसाहुणं की नीले रंग की साधना से शरीर आसमान की तरह साफ होकर उस पर कोई दाग नजर नहीं आता है। अगले चार दिन की साधना इसलिए की जाती है ताकि वापस संक्रमण नहीं हो पाए। नौ दिन की साधना के बाद मैनासुंदरी उस पानी का छिड़काव 700 कोढ़ियों पर करती है तो वह सभी भी स्वस्थ हो जाते है।
भीतर के कान बंद हो जाए तो अच्छी सलाह भी सुनाई नहीं देती
प्रज्ञामहर्षि डॉ. समकितमुनिजी ने कहा कि मुंह खुला रखना या बंद रखना, आंखे खुली रखना या बंद रखना हमारे हाथ में है लेकिन भीतर के कान तब खुल जाते ओर तब बंद हो जाते हमे पता ही नहीं चलता। भीतर के कान बंद हो जाते है तो आदमी फिर अच्छी सलाह को भी सुन नहीं पाता है। विभीषण ने रावण को कितना समझाया सीता को लौटा दो लेकिन रावण के भीतर के कान बंद होने से वह अच्छी सलाह को भी सुन नहीं पाया। इसी तरह मैनासुंदरी की शादी कोढ़ी से करने के राजा के निर्णय पर मंत्री व कई जनें उसे समझाते ऐसा मत करों लेकिन राजा के भीतर के कान बंद हो जाने से वह उसे सुनता नहीं है।
उत्तराध्ययन आगम की 21 दिवसीय आराधना कल से
दीपावली से पूर्व भगवान महावीर स्वामी की अंतिम देशना उत्तराध्ययन आगम की 21 दिवसीय आराधना मंगलवार 24 अक्टूबर से शुरू होंगी। इस अवधि में प्रतिदिन सुबह 8.15 से 9.30 बजे तक उत्तराध्ययन आगम के 36 अध्यायों का वाचन किया जाएगा। इस अवधि में प्रतिदिन निर्धारित समय पर प्रवचन में आने वाले श्रावक-श्राविकाओं को लक्की ड्रॉ के माध्यम से एक-एक चांदी के सिक्के की प्रभावना दी जाएगी। पूज्य समकितमुनिजी ने कहा कि सभी श्रावक-श्राविकाएं इस आराधना में शामिल होने की भावना रखे ओर अन्य को भी इससे जुड़ने के लिए प्रेरित करें।
उक्त जानकारी सचिन रमेशचन्द्रजी टाटिया अध्यक्ष, आदिनाथ सोसायटी जैन स्थानक भवन ट्रस्ट, पूणे तथा निलेश कांठेड़ मीडिया समन्वयक,समकित की यात्रा-2023 ने दी।

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