प्रतिकूल परिस्थिति में ज्ञान ही बनाता है मन का संतुलन- आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा.

रतलाम, 26 अक्टूबर। समय, स्थिति, परिस्थिति भले ही कितनी भी प्रतिकूल हो, हम ज्ञान के माध्यम से उससे पार पा सकते है। यहीं आर्ट आॅफ लाइफ है। ज्ञान ऐसी चीज है, जिसके अभाव में लोग गलत मार्ग पर चल पड़ते है। कई लोग छोटी-छोटी बातों पर जीवन तक समाप्त कर लेते है। यदि उनमें ज्ञान होता तो मन का संतुलन बना रहता और वह विपरित परिस्थिति से पार पा सकते थे।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने गुरूवार को सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में आयोजित विषेष प्रवचनमाला के दौरान कही। आचार्य श्री ने ज्ञान और क्रिया को परिभाषित करते हुए कहा कि समय भले ही खराब चल रहा हो, लेकिन हमें अपने मन को कमजोर नहीं होने देना है और यह सिर्फ ज्ञान से ही संभव है।
आचार्य श्री ने कहा कि जीवन में ज्ञान और क्रिया का बहुत महत्व है। यह एक ही तराजू के दो पलड़े है। प्रभु की भक्ति कैसे करना है, यह हमें पता होना चाहिए। हम क्रिया तो पूर्ण कर लेते है लेकिन करना कैसे है, उसका पता नहीं होता है। क्रिया करना कैसे है, उसका ज्ञान नहीं हो, तो वह पूर्ण नहीं होती है। ज्ञान जहां से मिले उसे प्राप्त करना चाहिए।
आचार्य श्री ने कहा कि ज्ञान यदि प्राप्त करना हो तो ज्ञानी पुरूषों के साथ सत्संग करना चाहिए, जिससे ज्ञान की प्राप्ती होती है। हमे ज्ञानी बनना है, जीवन में ज्ञान का बढ़ा महत्व है। श्रीपाल और मयणा का प्रसंग भी ऐसा ही है। मयणा के जीवन में विपरीत परिस्थिति थी लेकिन फिर भी उसने उसे प्रतिकूल बना लिया। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।

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