रतलाम, 26 अक्टूबर।तन के मोह और मन के मोह से संघर्ष करना ही संयम है। संयम लेने से पहले संकल्प और संयम लेने के बाद समर्पण का भाव बढ़ना चाहिए। संयम ही जीवन है और इससे जीवन की प्रसन्नता मिलती है। बिना संयम के ना तो प्रसन्नता प्राप्त होती है और ना ही पवित्रता प्राप्त होती है। यह बात परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युग पुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी म.सा. ने कही। छोटू भाई की बगीची में प्रवचन के दौरान संयम का महत्व बताते हुए उन्होंने कहा कि संतों के जीवन में प्रसन्नता और पवित्रता का एकमात्र राज उनका संयम है। वर्तमान समय में संतों में संयम बढ़ना चाहिए और सांसारियों में संतोष बढ़ना चाहिए। सांसारी व्यक्ति जितना संतोष रखेगा, उतना ही प्रसन्न एवं पवित्र रहेगा। आचार्यश्री ने कहा कि विडंबना है कि आज संसार में संतोष घट रहा है और असंतोष बढ़ रहा है। इससे अशांति, अराजकता एवं अव्यवस्थाएं फैल रही है। सांसारी व्यक्ति यदि संयम नहीं ले सकता तो, संतोष तो रख ही सकता है। हर सांसारी को अपने जीवन का आदर्श संतोष को रखना चाहिए। इससे आत्मा से महात्मा और फिर परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त होगा। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनिजी म.सा. ने धर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि धर्म भावना देता है और हमें धर्म की प्रभावना करनी चाहिए। प्रवचन में श्री धैर्य मुनिजी म.सा. ने भी विचार रखे। इस अवसर पर कई धर्मालुजनों ने तपस्या के प्रत्याख्यान लिए। कई श्रावक एवं श्राविकागण उपस्थित रहे।
दो दिवसीय 27 वां वार्षिक अधिवेशन शुक्रवार से होगा
श्री अखिल भारतवर्षीय साधुमार्गी शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ का 27 वां वार्षिक अधिवेशन 27-28 अक्टूबर को रतलाम में होगा। मुख्य अधिवेशन में परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा के 28 अक्टूबर को दोपहर 2 बजे प्रवचन एवं मांगलिक होंगे। रतलाम श्री संघ के अध्यक्ष मोहनलाल पिरोदिया एवं महामंत्री दिलीप मूणत ने बताया कि अधिवेशन में शामिल होने देश के विभिन्न स्थानों से प्रतिनिधि रतलाम आएंगे। अध्यक्षता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजू भूरट द्वारा की जाएगी।