वैदिक जाग्रति ज्ञान-विज्ञान पीठ, ज्योतिष शिक्षण जनकल्याण समिति और पंचांग निर्माणकर्ता की बैठक आयोजित


रतलाम। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं इसे रास पूर्णिमा भी कहा जाता है।
इस अमृतमय रात्रि में चंद्रदेव की सात्विक और सौम्य किरणें पृथ्वी पर पड़ती है , शरद पूर्णिमा की रात्रि में श्वेत वस्त्र धारण कर चंद्र स्नान से रोग व्याधि भी समाप्त हो जाती है इस दिन चंद्र के प्रकाश में खुले आकाश में रखी गई खीर या दूध के सेवन से स्वास्थ्य तेज बल की प्राप्ति होती है तथा जो भी शरदपूर्णिमा पर रात्रि जागरण कर इंद्र व लक्ष्मी जी का ध्यान करता हैं उसे मनानुकूल फ़ल प्राप्ति होती हैं।
इस बार शरद पूर्णिमा 28 अक्टूबर को खण्डग्रास चंद्रग्रहण पड़ रहा है जिसके चलते जनमानस में शरद पूर्णिमा पर रखी जाने वाली खीर/दूध और उसके नियम संबंधी समस्या की स्थिति निर्मित हो रही है जिसको लेकर वैदिक जाग्रति ज्ञान-विज्ञान पीठ व ज्योतिष शिक्षण जनकल्याण समिति और पंचांगनिर्माण कर्ता कि बैठक मानस धाम शक्तिनगर पर आयोजित की गई। बैठक डॉ.विष्णु कुमार शास्त्री जी ने बतलाया बताया गया कि इस बार पढ़ने वाला खंडग्रास चंद्रग्रहण 28/29 की रात्रि में 1:05 से प्रारंभ होगा जो रात्रि 2:24 पर समाप्त होगा ग्रहण का पर्वकाल 1 घंटा 19 मिनट रहेगा साथ ही इस ग्रहण का सूतक 28 अक्टूबर को ही अपराह्न सांय 4:05 से आरंभ हो जाएगा। ऐसे में शास्त्रोक्त नियम अनुसार वेधकाल के अंतर्गत आस्तिक सज्जनों को भोजन शयन सांसारिक सौख्यता का परित्याग कर देना चाहिए , बालक वृद्धि रोगी आतुरजन तथा गर्भवती महिलाओं को नितांत आवश्यक व परिस्थितियों में आवश्यक मात्रा में पेय व खाद्य पदार्थ क़े सेवन की शास्त्रों में आज्ञा दी गई है पर ग्रहणकाल क़े दौरान वर्जित माना है।
बैठक में शास्त्रोक्त नियम अनुसार निर्णय लिया गया कि ग्रहणकाल होने के चलते इस बार दूध/खीर का भोग ग्रहण समाप्ति उपरांत स्वयं स्नान व देवस्नान पूजन कर भगवान को नैवेद्य अर्पण किया जाएगा। ,
पं.जीवन पाठक ने बतलाया कि ग्रहण क़े सूतक आरंभ 28 को सायं 4:5 क़े पूर्व ही खीर की प्रसादी को में कुशा(डाब) रख दे तथा रात्रि में ग्रहण पूर्व तक रात्रि 1:05 के पूर्व तक या ग्रहण समाप्ति उपरान्त उसे चंद्रमा की रश्मि में खुले आकाश में रखा जा सकता है ग्रहणकाल के दौरान खीर/दूध की प्रसादी हटा लें ,
ग्रहण समाप्ति उपरांत स्नान कर देवपूजन कर दूध/खीर का नैवेद्य भगवान को अर्पण कर तदुपरांत प्रसादी ग्रहण की जा सकती हैं।
पं.अशोक वशिष्ठ जी ने बतलाया कि ग्रहण काल में निर्मित किए गए खाद्य पदार्थों में तुलसी की अपेक्षा कुशा (डाब) ही रखना चाहिए , शास्त्रों में कुश को ही ग्रहणकाल में महत्वपूर्ण माना गया है न कि तुलसीदल को , कुशा(डाब) ग्रहण के दौरान वातावरण में हानिकारक विकिरणों को भोज्य पदार्थों से दूर करती हैं , सूतक वह ग्रहणकाल के मध्य स्नान कर कामना अनुरूप देव पूजन अनुष्ठान जप इत्यादि करने से उसका सहस्त्रो गुना पुण्य लाभ प्राप्त होता हैं।
ग्रहणकाल के आरम्भ पूर्व तथा ग्रहण समाप्ति उपरान्त आरोग्यदायक रश्मि को प्राप्त करने हेतु खुले आकाश में खीर/दूध की प्रसादी रखी जा सकती। बैठक में सिद्धविजय पञ्चाङ्ग के निर्माणकर्ता डॉ. विष्णु कुमार शास्त्री महर्षि संजयशिवशंकर दवे पं.अशोक वशिष्ठ पं.ओमप्रकाश शर्मा पं.जीवन पाठक पं.चेतन शर्मा पं.जितेंद्र नागर पं.महेशानंद शास्त्री पं.चेतन शर्मा पं.हेमंत शर्मा पं.ईश्वर व्यास पं. नरेश शर्मा पं.कृष्णा शर्मा पं.सोमेश शर्मा सहित विप्रबन्धु मौजूद थे