

रतलाम, 1 नवम्बर। मनुष्य की तीन कमजोरी- शरीर में कस नहीं, मन हमारे बस में नहीं और हमे धर्म में रस नहीं होता है। व्यक्ति यदि एक रोटी कम खाता है तो कमजोरी आ जाती है, ज्यादा खा ले तो बदहजमी होती है। हमारे निर्णय और विचार थोड़े समय में बदलत रहते है। यदि हमने अपनी कमजोरियों पर विजय पा ली, तो कल्याण हो जाएगा।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने सैलाना वालों की हवेली मोहन टाॅकीज में प्रवचन में कही। आचार्य श्री ने रूप वैभव, पुण्य वैभव और गुण वैभव को परिभाषित करते हुए कहा कि प्रभु के पास जो रूप है उसके जैसा वैभव किसी के पास नहीं है। बुद्धि भी दो प्रकार की- देह बुद्धि और आत्म बुद्धि होती है। 24 घंटे हमारी नजर देह पर होती है, तो वह देह बुद्धि कहलाती हैं जबकि देह को नजर अंदाज कर आत्म तत्व की पहचान करना आत्म बुद्धि कहलाती है।
आचार्य श्री ने कहा कि संपत्ति, सामग्री, स्वजन कुछ भी हमारे करीब नहीं है। हमारे सबसे नजदीक यदि कोई है तो वह हमारा शरीर है। जो करीब होता है, उसके प्रति हमारा लगाव अधिक होता है। जब हमारे अंदर कुदरती सौंदर्य है तो फिर बाहरी आवरण की जरूरत नहीं होना चाहिए। भीतर की दृष्टि से शरीर की अशुचिता दिखेगी, बाहर की दृष्टि से नहीं, इसलिए आत्म दृष्टि जगाओं और प्रभु से आत्म वैभव प्राप्त करने का प्रयास करो। श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ गुजराती उपाश्रय, श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वेताम्बर तीर्थ पेढ़ी द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे।