छोटू भाई की बगीची में प्रवचन आयोजित
कई धर्मावलंबियों को सुनाई महामांगलिक
रतलाम। संसार में जब तक चाह और राह एक नहीं होती, तब तक कल्याण नहीं हो सकता। वर्तमान समय में सभी कल्याण चाहते है, लेकिन चाहने से कुछ नहीं होता। कल्याण के लिए हमे प्रभु के बताए मार्ग पर चलना पडेगा। इस मार्ग पर जो भी चले है, उनका कल्याण हुआ है और वे महापुरूष बने है। मिथ्यात्म सबसे बडा दोष है और सम्यत्व सबसे बडा गुण हैं। गौतम प्रतिपदा पर सभी संकल्प ले कि हमे सम्यत्व प्राप्त हो।
यह संदेश देते हुए परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कई धर्मावलंबियों को महामांगलिक श्रवण कराई। उन्होंने कहा कि हम प्रतिदिन किसी ना किसी महापुरूष को याद करते है और चाहते है कि उनके जैसा व्यक्तित्व एवं कृतित्व हमे प्राप्त हो जाए। महापुरूषों ने ज्ञान, ध्यान और आचरण का जो मार्ग बताया है, उसपर चलने से ही कल्याण होता है। गौतम स्वामी, सुधर्मा स्वामी आदि ने इसी मार्ग पर चलकर अपना कल्याण किया है।
आचार्यश्री ने कहा कि संसार में सफल वहीं होता है, जो गुण की प्राप्ति और दोष से मुक्ति का प्रयास करता है। सुखी होने के लिए अपने दोषों का अवलोकन करो, आलोचन करो और दोषों से दूरी बनाओ। दोष मुक्ति सबसे ज्यादा जरूरी है, क्योंकि इसके बिना गुणांे की प्राप्ति नहीं हो सकती। सम्यत्व का गुण सबसे बडा गुण है। इसे जो प्राप्त कर लेता है, उसे सिद्धी मिल जाती है। संसार में जितने भी केवली हुए, उन्होंने पहले सम्यत्व मिला, फिर अंगार बने और उसके बाद केवल ज्ञान को प्राप्त हुए है।
आचार्यश्री ने कहा कि वृक्ष मूल पर खडा होता है, यदि मूल नहीं हो, तो वृ़क्ष का अस्तित्व नहीं रहता। सम्यत्व मूल है। सही को सही मानना, सही को सही जानना और सही व्यवहार करना ही सम्यत्व है। तप, चारित्र और संयम यदि वृक्ष है, तो उनका मूल सम्यत्व ही है। जैसे मकान बनाने के लिए पहले नींव मजबूत करते है। वैसे ही सम्यत्व की नींव मजबूत होनी चाहिए, इसपर ही तप, संयम और चारित्र का वृक्ष मजबूत बनता है।
आचार्यश्री ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी का सानिध्य नहीं मिला, तब तक गौतम भी विचरण ही कर रहे थे। उन्हें आत्मा को लेकर संदेह था। भगवान ने जैसे ही उनके संदेह का निवारण किया, वे भक्त बन गए और ताउम्र भगवान के साथ रहकर अपना कल्याण किया। उनके जैसे ही सबको दृष्टिकोण बदलना होगा। संदेह से बाहर आकर यदि सम्यत्व प्राप्ति के प्रयास किए तो सिद्धी भी प्राप्त हो जाएगी।
उपाध्याय प्रवर श्री जितेशमुनिजी मसा ने इस मौके पर मिथ्यात्म के दोष पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि दोषों से बचकर ही गुणों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। तरूण तपस्वी श्री युगप्रभ मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। इस मौके पर कई श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।