
जावरा (अभय सुराणा) । हर पल हजारों जीव जन्म लेते हैं और मानव रूप में इस धरती पर अवतार लेते रहते हैं, लेकिन हर किसी की जयंती नहीं मनाई जाती है। न ही सभी को श्रद्धा और सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। केवल उन्हीं लोगों को सम्मान और श्रद्धा मिलती है जो अपने लिए नहीं बल्कि समाज के लिए जीते हैं। जो लोगों के उत्थान, विकास और कल्याण के लिए अपनी सारी जीवन शक्ति समर्पित कर देते हैं। उपरोक्त विचार दिवाकर भवन पर मेवाड़ गौरव प्रखर वक्ता प्रवचनकार श्री रविन्द्र मुनि जी म.सा.नीरज ने गुरु सप्ताह अंतर्गत धर्मसभा को संबोधित करते हुए फ़रमाया की श्रमण संघ के प्रथम आचार्य श्री आत्मारामजी गुणों की खान थे आपने 60 के लगभग ग्रंथ लिखे, बड़े-बड़े शास्त्रों का भाषानुवाद किया। ‘तत्त्वार्थ सूत्रा’ (जैनागम-समन्वयद्ध)आपकी एक विलक्षण एवं अपूर्व रचना है। 12 वर्ष की अल्प आयु में आपने जिस श्वेत चादर को धरण किया था, उसकी श्वेतिमा को कभी मटमैला नहीं होने दिया। प्रत्युत उसे पहले से भी अधिक चमका करके दिखाया। यही कारण है कि आपका जीवन साध्ना-जनित चमत्कारों का एक निराला भण्डार रहा है। वे स्वयं जहां अपने कल्याण के प्रति सचेत रहते हैं, वहीं दूसरों के कल्याण का भी पूरा ध्यान रखते हैं।आचार्य सम्राट पूज्य श्री आत्माराम जी महाराज उन महापुरुषों में से एक थे जिनका जीवन सदैव परोपकारी कार्यों में लगा रहा। जो गंगा की तरह लगातार लोगों के जीवन को शुद्ध करने में लगे हुए थे। अपने जीवन के 77 वर्षों तक वे अहिंसा, संयम और तपस्या का दीप जलाते रहे। उनके जीवन की धारा जहां-जहां से गुजरी, वहां अद्भुत शालीनता और श्रद्धा देखने को मिली। आज भी उनके अमर वचन लोगों के जीवन के लिए प्रकाश स्तंभ का काम कर रहे हैं। श्रमण संघ के दुसरे आचार्य आनन्द ऋषिजी जिन्होंने 13 साल की उम्र में अपना शेष जीवन जैन संत के रूप में बिताने का फैसला किया। उनकी दीक्षा (अभिषेक) 7 दिसंबर, 1913 (मार्गशीर्ष शुक्ल नवमी) को अहमदनगर जिले के मिरी में हुई थी। तब उन्हें आनंद ऋषि जी महाराज नाम दिया गया। उन्होंने पंडित राजधारी त्रिपाठी के मार्गदर्शन में संस्कृत और प्राकृत स्तोत्र सीखना शुरू किया। वे जैन धर्म दिवाकार चोथमलजी महाराज के साथ धार्मिक विचार-विमर्श किया करते थे, जिन्होंने आनंद ऋषि जी की आचार्य बनने की क्षमता को महसूस किया और अपनी इच्छा को अपने अनुयायियों तक पहुंचाया। उन्होंने 1920 में अहमदनगर में जनता को अपना पहला प्रवचन दिया। आनंद ऋषिजी महाराज (1900-1992) एक जैन धार्मिक संत थे। भारत सरकार ने 9 अगस्त 2002 को उनके सम्मान में एक स्मारक डाक टिकट जारी किया। उन्हें राष्ट्र संत की मानद उपाधि से सम्मानित किया गया था। उनका जन्म 27 जुलाई 1900 को अहमदनगर (महाराष्ट्र) में हुआ था और उन्होंने आचार्य रत्न ऋषिजी महाराज के साथ तेरह साल की उम्र से दीक्षा प्राप्त की, जिनकी मृत्यु 1927 में अलीपुर में हुई थी। वह अपने बचपन से ही पवित्र थे, और कम उम्र में धार्मिक शिक्षा लेना शुरू कर दिया था। 1964 से 1992 में अपनी मृत्यु तक, वह एक जैन धार्मिक निकाय वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के दूसरे आचार्य थे।आचार्य श्री देवेन्द्र मुनि जी महाराज जैन स्थानकवासी श्वेतांबर श्रमण संघ के तृतीय जैन आचार्य सम्राट थे। जैन स्थानकवासी श्वेतांबर श्रमण संघ के उपाचार्य के रूप में पदनाम पुणे (महाराष्ट्र) में घोषित किये गये जैन स्थानकवासी श्वेतांबर श्रमण संघ के आचार्य के रूप में पदनाम को सुसोभीत किया चतुर्थ पट्टधर आचार्य शिव मुनिजी जैन अनुयायियों द्वारा लोकप्रिय और श्रद्धापूर्वक संबोधित किए जाने वाले डॉ. शिव कुमार, जैनियों के आध्यात्मिक प्रमुख आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि जी महाराज हैं, एक पवित्र आत्मा हैं जिनकी आंतरिक पवित्रता और अच्छाई उनके चेहरे पर दिव्य महिमा में परिलक्षित होती है। वैराग्य, तप, आत्मज्ञान और ध्यान समभाव से रहने वाले उनके पवित्र जीवन के चार स्तंभ हैं। उसका मन हमेशा ज्ञान की खोज में रहता है और ध्यान में मग्न रहता है। वह श्रमण संघ की जिम्मेदारियों को निभाते हुए श्रमण संघ का नेतृत्व कर रहे हैं। उपरोक्त जानकारी श्रीसंघ अध्यक्ष इंदरमल टुकड़िया कार्यवाहक अध्यक्ष ओमप्रकाश श्रीमाल ने दी ।धर्म सभा का संचालन महामंत्री महावीर छाजेड़ ने किया ।