रतलाम,23 नवंबर। परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने गुरूवार को जिदंगी का व्याकरण बताया। उन्होंने कहा कि हिन्दी का व्याकरण, संस्कृत का व्याकरण और प्राकृत का व्याकरण सबने सुना होगा, लेकिन जिंदगी का व्याकरण सत्य, प्रेम और करूणा है। सत्य अपने लिए, प्रेम दूसरों के लिए और करूणा सबके लिए होना चाहिए।
आचार्यश्री ने छोटू भाई की बगीची में प्रवचन देते हुए कहा कि सत्य को सामान्य तौर लोग दूसरों के लिए मानते है, लेकिन वे ये नहीं जानते कि सत्य की नांव पर सवार व्यक्ति ही सदैव तिरता है। सत्य को सदैव अपने लिए मानना चाहिए। भारतीय संस्कृति तो सत्यमेव जयते में विश्वास रखती है, क्योंकि माना जाता है कि जो सत्य को पा लेता है, वह भगवान को पा लेता है। सत्य में भगवान बसते है। उन्हें पाना है, तो सत्य से प्रेम करना चाहिए।
आचार्यश्री ने कहा कि प्रेम आदान-प्रदान करने से बढता है। इसलिए इसे हमेशा दूसरो के लिए रखना चाहिए। प्रेम मे ंभी ईश्वरीय शक्ति होती है, जो भगवान को भी आकर्षित करती है। करूणा का भाव सबके लिए होना चाहिए, क्योंकि करूणा और संवेदना का दायरा बहुत बडा है। इसे जितना विस्तारित करेंगे, उतना लाभ मिलेगा। सत्य, प्रेम और करूणा ही सम्यक ज्ञान, दर्शन और चारित्र प्राप्ति के मार्ग है। सत्य से आत्मा परमात्मा बन सकती है। आरंभ में सेवानिष्ठ श्री अनुपम मुनिजी मसा ने विचार व्यक्त किए। इस दौरान बडी संख्या में श्रावक-श्राविकागण उपस्थित रहे।