रतलाम,26 नवंबर। परम पूज्य, प्रज्ञा निधि, युगपुरूष, आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने रविवार को संतों के उपदेश पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्हांेने कहा कि संत आसक्ति छोड सज्जन बनने, घर छोड साधु बनने, आग्रह छोड शिष्य बनने और देह छोड उन्मुक्त बनने की प्रेरणा देते है। काया का मोह त्यागे बिना तपस्या, माया का मोह त्यागे बिना दान, कुटुम्ब का मोह छोडे बिना संयम और किर्ती का मोह त्यागे बिना सिद्धी नहीं मिलते।
छोटू भाई की बगीची में आयोजित प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि आसक्ति मनुष्य को दुर्जन बनाती है। दुर्जन अपने लिए अभिशाप होता है और दूसरांे के लिए भी अभिशाप रहता है। इसके विपरीत सज्जन वरदान होता है। कोई भी व्यक्ति आसक्ति छोडे बिना सज्जन नहीं बन सकता। अनासक्त व्यक्ति मोह का त्यागी होता है। जबकि राग और मोह में जीने वाला दुर्जन हो जाता है। संत इसीलिए आसक्ति छोडकर सज्जन बनने को कहते है। सज्जन बनने के प्रयास में यदि आत्म बल जाग जाता है, तो ऐसे व्यक्ति को घर छोड साधु बनने को प्रेरित किया जाता है। साधु जीवन में जो आनंद है, वह संसार में कही नहीं होता। विडंबना है कि सौ में, हजार में, लाख में नहीं करोडों में कोई एक व्यक्ति ही आज साधु बनने की चाह रखता है।
आचार्यश्री ने कहा कि अहम, आवेश और आग्रह छोडकर शिष्य बनने की प्रेरणा खुद के लिए कल्याणकारी होती है। इसी प्रकार देह छोडकर उन्मुक्त बनने का संदेश जीवन को सार्थक करने के लिए है। देह की आसक्ति में रहने वाला हमेशा संसार में भटकता रहता है। आरंभ में उपाध्याय प्रवर श्री जितेशमुनिजी मसा ने चातुर्मासिक चतुदर्शी पर प्रकाश डाला। उन्होंने तप, त्याग द्वारा आत्मा को निर्मल बनाने पर बल दिया। रतलाम श्री संघ की और से विजेन्द्र गादिया, बहु मंडल और महिला मंडल ने भाव व्यक्त किए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया। 27 नवंबर को आचार्यश्री के प्रवचन सिलावटों का वास स्थित नवकार भवन में होंगे। 28 नवंबर को अभ्युदय चातुर्मास पूर्ण कर आचार्यश्री एवं संत-साध्वी मंडल नवकार भवन से विहार करेंगे। वे नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुए न्यूरोड पहुंचेंगे, जहां ब्राहम्ण बोर्डिंग में प्रवचन का आयोजन होगा।
रतलाम का चातुर्मास साताकारी रहा
आचार्यश्री ने छोटू भाई की बगीची में आयोजित अभ्युदय चातुर्मास के अंतिम प्रवचन में कहा कि रतलाम चातुर्मास साताकारी रहा। उनका रतलाम में ये तीसरा चातुर्मास है। पहला चातुर्मास 1983 में तथा दूसरा चातुर्मास 1988 में नोलाईपुरा स्थित समता भवन में किया था। दूसरे चातुर्मास में गुरूदेव आचार्यश्री नानालालजी मसा की निश्रा में प्रतिदिन हनुमान रूण्डी में प्रवचन हुआ करते थे। रतलाम वासियों में धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा का भाव है, जो अनुकरणीय है।