मोहन टॉकीज में पूर्ण हुई पंच दिवसीय प्रवचन श्रेणी


रतलाम, 22 मार्च। सफलता का मार्ग पाने के लिए हम बहुत भागे है एक बार शांति का मार्ग पाने के लिए कोशिश तो करें। सफलता का मार्ग हिटलर का है जबकि शांति का मार्ग प्रभु का है। हिटलर के मार्ग पर चलने वाले को सफलता भले ही मिल जाए लेकिन शांति कभी नहीं मिलती। शांति के लिए प्रभु के मार्ग पर ही चलना होगा।
यह बात आचार्य श्री विजय कुलबोधि सूरीश्वरजी म.सा. ने मोहन टॉकीज में आयोजित पंच दिवसीय प्रवचन श्रेणी के अंतिम दिन प्रवचन में कहीं। आचार्य श्री ने कहा कि डिप्रेशन उसे होता है, जिसे भविष्य का डर होता है, जो हमारा वर्तमान खत्म कर रहा है। आसमान में चमकने वाली हर बिजली जमीन पर गिरे यह जरूरी नहीं है, जमीन पर गिरने वाली बिजली भी हम पर गिरे यह भी जरूरी नहीं तो फिर भविष्य की चिंता में वर्तमान का सुख क्यों खराब करते हो।
आचार्य श्री ने ” मन के दोषों को कैसे दूर करें ” उसके लिए चार प्रकार की गति का उल्लेख करते हुए कहा कि सुकर गति वाला व्यक्ति जहां भी जाता है, वहां दोषों को तलाशता है। चाहे वह सज्जन हो या दुर्जन। हम जब सब्जी लेने जाते तो हमारी नजर ताज़ी सब्जी पर होती है, कीचड़ में खिले कमल पर होती है तो किसी व्यक्ति से मिलने पर उसके गुणों पर क्यों नहीं पड़ती है।
आचार्य श्री ने कहा कि किसी को भी अपनी निंदा सुनना पसंद नहीं है। धर्म के मामले में आपका मन चंचल है क्योंकि आपको लगाव नहीं है और संसार के मामले में आपको रस है इसलिए आपका मन उसमें लगा रहता है। धर्म के क्षेत्र में रस पैदा करने से चंचलता की अस्थिरता की शिकायत नहीं होगी। आत्म कल्याण के लिए हमें अपने मन को स्थिर रखना होगा, जिसके लिए हम को तैयार नहीं है।
आचार्य श्री ने दृष्टि दोष और दोष दृष्टि को परिभाषित करते हुए कहा कि जिसकी नज़रों में दोष हो वह दोष दृष्टि कहलाता है, लेकिन जिसकी आंखों में विकार नजर आए वह दोष दृष्टि है। यदि हम ना पसंद आइटम को पहले खाएंगे तो पसंद का आइटम खाने का मौका नहीं मिलेगा, ठीक वैसे ही यदि हम किसी के दोषों को पहले देखेंगे तो गुण देखने का मौका नहीं मिलता है। हमें अपने दोषों को दूर करने के लिए और मन की शांति के लिए प्रभु के मार्ग को आत्मसात करना होगा।
श्री देवसूर तपागच्छ चारथुई जैन श्रीसंघ, गुजराती उपाश्रय श्री ऋषभदेवजी केशरीमलजी जैन श्वे. पेढी, रतलाम द्वारा आयोजित प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थिति रहे।