राजा भोज ने भय से जनता को मुक्त किया, भाग्य के साथ कर्म की महत्ता को प्रतिपादित किया- दशोत्तर

रतलाम। विश्व में शासक तो कई हुए हैं लेकिन परमार (पॅंवार) राजवंश और मालवा को गौरवान्वित करने वाले, माॅं सरस्वती के वरद पुत्र महाराजा भोज उन सभी में अद्वितीय थे। महाराजा भोज का जन्म भी माॅं सरस्वती के प्राकट्य दिवस बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। महाराजा भोज एकमात्र ऐसे शासक रहे हैं, जिनके एक हाथ में शस्त्र थे तो दूसरे हाथ में शास्त्र थे। उक्त विचार नरेन्द्रसिंह पॅंवार (गढ़ी भैंसोला ) ने राजा भोज जनकल्याण सेवा समिति द्वारा भोज जयंती पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए।उक्त जानकारी देते हुए संस्था के जिला संयोजक नरेन्द्रसिंह डोडिया ने बताया कि इस अवसर पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अनुनाद संस्था के संरक्षक एडवोकेट सुरेन्द्र शर्मा थे।श्री पॅंवार ने भोज के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए आगे बताया कि भोज की खड्ग का तेज इतना था कि मोहम्मद गजनी को भी उनका नाम सुनकर उलटे पैर लोटना पड़ा था। भोजदेव के पराक्रम के कारण ही मालवा का गौरव बढ़ा और राज्य विस्तार भारत के अधिकांश भूभाग पर स्थापित हुआ था।प्राचीनकाल से लेकर वर्तमान काल तक शायद ही कोई ऐसा शासक रहा हो जिसने स्वयं विविध विषयक 84 ग्रंथों की रचना की हो और जो वास्तुशास्त्र, ज्योतिष शास्त्र से लेकर ज्ञान विज्ञान की सभी विधाओं में सिद्धहस्त हो। महाराजा भोज ने धार में सरस्वती सदन (भोजशाला) की स्थापना की थी जिसमें 500 विद्वान हर समय ज्ञानार्जन करवाते थे। भोजशाला उस समय के विख्यात शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की थी।महाराजा भोजदेव एकमात्र ऐसे शासक थे जिन्होंने केदारनाथ, सोमनाथ से लेकर अनेक स्थानों पर विशाल शिवमंदिरों के निर्माण करवाया था।जब महाराजा भोज ने इस संसार से विदा ली तब उनके बारे में जो विद्वानों ने कहा ऐसा अभी तक किसी शासक के बारे में नहीं कहा है-अद्य धारा निराधारा, निरालम्बा सरस्वती।पण्डिता: खण्डिता: सर्वें, भोज राजे दिवंगते।।अपने संदेश में साहित्यकार आशीष दशोत्तर ने महाराजा भोज के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते बताया कि राजा भोज उन शासकों में रहे जिन्होंने भय से जनता को मुक्त किया, भाग्य के साथ कर्म की महत्ता को प्रतिपादित किया। वे अपने साहस से अपने समय को शौर्य और पराक्रम का पूरक बनाते रहे। राजा भोज के साम्राज्य की धमक दूर देशों तक भी थी। उन्होंने सत्य की राह पर चलते हुए सफलता के सोपान रचे,जिनका गुणगान आज भी किया जाता है।इस अवसर पर उपस्थित अनुनाद संस्था के अध्यक्ष अजीत जैन, अशोक शर्मा, श्रीमती उमा पॅंवार, अक्षयसिंह डोडिया, राजेश शर्मा, गणेश मिश्रा, जयंत उपाध्याय, रतन कोल्हे आदि ने भी महाराजा भोज के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की।