
जावरा (अभय सुराणा) । तपस्विनी विदुषी पूज्य महासती सरिताश्री जी महाराज साहब मधुर व्याख्यानी प्रियंकाश्री जी महाराज साहब के पावन सानिध्य में दिवाकर भवन पर प्रवचन के माध्यम धर्म सभा को संबोधित करते हुए फरमाया कि ज्ञानवार्णीय कर्म आत्मा की ज्ञान शक्ति को ढँक देता है। जिन लोगों का ज्ञानवार्णीय कर्म कम होता है, वे अधिक बुद्धिमान होते हैं और आसानी से सीखते हैं, जबकि जिन लोगों का ज्ञानवार्णीय कर्म अधिक होता है, उन्हें ज्ञान को धारण करने में समस्या होती है। ज्ञानवार्णीय कर्म के पाँच उप-प्रकार हैं 1 मति-ज्ञानावरणीय कर्म 2 श्रुत-ज्ञानावरणीय कर्म 3अवधी-ज्ञानावरणीय कर्म 4 मनः-पर्याय-ज्ञानावरणीय कर्म 5 केवल-ज्ञानावरणीय कर्म।मति-ज्ञान उस ज्ञान को कहते हैं जो इंद्रियों और मन के प्रयोग से प्राप्त होता है। जो कर्म मन और इंद्रियों के इस कार्य को अवरुद्ध करता है, उसे मति-ज्ञानवर्णीय कर्म कहते हैं। इसलिए, यदि किसी व्यक्ति का मति-ज्ञानवर्णीय कर्म अधिक है, तो वह कम बुद्धिमान होगा, जबकि यदि किसी का मति-ज्ञानवर्णीय कर्म कम है, तो वह अधिक बुद्धिमान होगा।
शब्दों, लेखन या हाव-भावों को समझकर प्राप्त होने वाले ज्ञान को श्रुतज्ञान कहते हैं। जो कर्म इस ज्ञान प्राप्ति की प्रक्रिया को अवरुद्ध करता है, उसे श्रुतज्ञानवार्णीय कर्म कहते हैं। इसी कारण यह समझा जा सकता है कि क्यों कुछ लोग एक बार पढ़ने के बाद ही चीज़ों को याद रख लेते हैं, जबकि कुछ लोग बार-बार पढ़ने के बाद भी उन्हें याद नहीं रख पाते। अवधिज्ञान के माध्यम से आत्मा, इंद्रियों या मन की सहायता के बिना, सामान्य आँखों से कहीं अधिक दूर तक भौतिक वस्तुओं को देख सकती है। इस प्रकार के ज्ञान को ढँकने वाले कर्म को “अवधिज्ञानवर्णीय कर्म” कहते हैं। विभिन्न लोग विभिन्न स्तरों का अवधिज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। मन:पर्यय-ज्ञान के माध्यम से आत्मा इंद्रियों और मन की सहायता के बिना दूसरों के मानसिक विचारों को जान सकती है। इस प्रकार के ज्ञान को ढँकने वाले कर्म को मन:पर्यय-ज्ञानवर्णीय कर्म कहते हैं। जो आत्मा उस जीवन में तीर्थंकर होगी, उसे सांसारिक जीवन के त्याग के समय मन:पर्यय-ज्ञान प्राप्त होगा। आत्मा में यह जानने की शक्ति होती है कि पूरे ब्रह्मांड में वर्तमान में क्या हो रहा है, भूतकाल में क्या हुआ था और भविष्य में क्या होगा। इस ज्ञान को केवलज्ञान कहते हैं और जो कर्म इस ज्ञान को ढँक देता है उसे केवल ज्ञानवर्णीय कर्म कहते हैं। अरिहंतों और सिद्धों ने केवल ज्ञानवर्णीय कर्म का नाश कर दिया है और इसीलिए उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ है।अन्य चार कर्म ज्ञान की संबंधित क्षमताओं का पूर्ण विनाश नहीं करते, अपितु प्रायः केवल अधिक या कम व्यवधान उत्पन्न करते हैं। ज्ञानवर्णीय कर्म के कारण अज्ञानता, समझने में असमर्थता, सीखने में असमर्थता, निरक्षरता और हकलाना तुतलाना होता है।यदि हम ज्ञान व ज्ञानी की निंदा करते हैं, अध्ययन और सीखने में आलस्य, अवमानना या नाराजगी दिखाते हैं, या ज्ञान और ज्ञान से संबंधित चीजों के प्रति कोई अनादर दिखाते हैं, जैसे कि पृष्ठों को फाड़ना या पुस्तकों को इधर-उधर फेंकना, तो ज्ञानवर्णीय कर्म संचित होता है।ज्ञान की आराधना, गुरुजनों के प्रति आदर और सम्मान, पुस्तकों के प्रति आदर, तथा धार्मिक पुस्तकों का नियमित रूप से विनम्रतापूर्वक अध्ययन करने से ज्ञानवर्णीय कर्म से छुटकारा पाया जा सकता है।जब हम ज्ञानवर्णीय कर्म से पूरी तरह मुक्त हो जाएँगे, तो हमें केवलज्ञान प्राप्त होगा और हम अनंतज्ञानी बन जाएँगे।
उपरोक्त जानकारी देते हुए श्री संघ अध्यक्ष इंदरमल टुकड़ियां एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष ओमप्रकाश श्रीमाल ने बताया कि तपस्वी जिनशासन रत्न प्रकाशजी पितलीया ने 73 उपवास के प्रत्याख्यान महासती जी से लिए । धर्म सभा का संचालन महामंत्री महावीर छाजेड़ ने किया आभार विनोद ओस्तवाल ने माना।