जब तक आप में संयम नहीं है और मस्तिष्क में विकार आते है, तब तक आप सुखी नहीं बन सकते – महासती श्री प्रियंका श्री जी महल. सा.

जावरा (निप्र)। संयम का मतलब बंध जाना। व्रत-नियम में कानून में बंध जाना। हरेक क्षेत्र में संयम की बड़ी आवश्यकता है। बंधन जब तक टूटता नहीं है, तब तक मुक्ति नहीं है और जब तक बंधन (संयम) नहीं है, तब तक मुक्ति नहीं है। जिस प्रकार ऊंट के लिए नकेल, घोड़ों के लिए लगाम, मोटर के लिए ब्रेक की आवश्यकता है, उसी प्रकार मनुष्य के लिए ब्रेक, बंधन, संयम की आवश्यकता है। कोई भी कार चाहे वह नई, सुन्दर हो, उसे ठीक रास्ते व ठीक गति से चलाने के साथ-साथ ब्रेक का प्रयोग भी करना पड़ेगा। नई कार की सुरक्षा के लिए भी इतने बंधन है।

उपरोक्त विचार धर्म सभा को संबोधित करते हुए दिवाकर भवन पर विराजित परम विदुषी तपस्विनी पूज्य महासती श्री सरिता श्री जी महाराज साहब मधुर व्याख्यानी पूज्य महासती श्री प्रियंका श्री जी महाराज साहब फ़रमाते हुए बताया कि समय अनादि कालीन बंधनों को तोड़ने के लिए एक बंधन है। मनुष्य पर ब्रेक नहीं हो तो इससे ज्यादा खतरा और किसी से नहीं होता। जब संयम नहीं है और मस्तिष्क में विकार आ जाता है, तब वह किसी को सुखी नहीं बना सकता।ज्ञान पर कन्ट्रोल की आवश्यकता नहीं है, पर ज्ञाता पर कंट्रोल की जरूरत है। हम दूसरे पदार्थों को कंट्रोल में रखकर व्यवस्था देख रहे हैं परन्तु अपने पर कंट्रोल नहीं चाहते। आचार्य कहते हैं कि समीचीन रूप से जो चलना, जानना है, आचरण करना है, उसका नाम संयम है। हमें अनादि काल से दुख का अनुभव करना पड़ रहा है, वह दूसरे पदार्थों के कारण से नहीं। संयम के अर्थ को आज तक हमने समझा ही नहीं है। संयम का अर्थ है प्राण और इन्द्रियों को कंट्रोल में रखना। जब ज्ञान धारा जानने की शक्ति को बिना कंट्रोल के छोड़ देते हैं, तभी दुख का अनुभव होता है। उपरोक्त जानकारी देते हुए श्री संघ अध्यक्ष समाज भुषण इंदरमल टुकड़ियां एवं वरिष्ठ उपाध्यक्ष ओमप्रकाश श्रीमाल ने देते हुए बताया कि प्रत्येक रविवार को जाप सम्पन्न हो रहे हैं इसी कडी में दशवेकालिक की गाथा के जाप रखे लाभार्थी राजेन्द्र कुमार जी सुशील जी राहुल जी श्रीश्रीमाल रहे। जन्माष्टमी पर फेंसी ड्रेस प्रतियोगिता आयोजित हुई जिसमें महावीर डांगी ग्रंथ प्रितेश कोचट्टा परी ऋषभ छाजेड़ अविषा जैन ने पुरुस्कार विजेता रहे ।धर्म सभा का संचालन महामंत्री महावीर छाजेड़ ने किया।