जैन धर्म का मूल है दया, करूणा अहिंसा, जियो और जीने दो : डॉ कमलप्रज्ञा म.सा.

अपने कर्मो के बारे डॉ संयमलता म.सा. ने सार गर्भित उद्बोधन दिया

रतलाम । भोजन परिवार के साथ बैठकर खाया जाए तो स्वादिष्ट लगता है। जब बेटे को पिता की बात बुरी लगे तब समझ लो कि कलयुग आ गया है। जो दुसरो को खिलाता है वह कभी भुखा नहीं रहता और जो दूसरों के सताता है वह कभी सुखी नही रह सकता है। परमात्मा भी अपने भक्तों की परीक्षा लेता हो और वह योग्य व्यक्ति को गद्दी पर बिठाता है । घर से निकले स्थानक के लिये सामयिक करने का मन में भाव है। रास्ते में आपको एक घायल जानवर आपको दिखता हो आप स्थानक पर पहुंच कर जमीन के पुंजनी से साफ करके आसन बिछाकर सामायिक करने बैट जाते है क्या वो सामायिक आपको फल देगी। बिल्कुल नहीं देगी क्योंकि रास्ते में जिस जीव की आपकी जरूरत भी आपने उसका ध्यान नहीं रखा । जैन धर्म का मूल है दया, करूणा अहिंसा, जियो और जीने दो। प्राणी मात्र के प्रति करुणा भाव। आपको अपनी करुणा उस घायल जीव के लिये करना थी आपका पहला धर्म यही है । उक्त विचार नीम चौक जैन स्थानक पर आयोजित धर्म सभा में डॉ कमलप्रज्ञा म सा ने व्यक्त किए ।
धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए जैन दिवाकरीय डॉ संयमलता म सा ने अपने कर्मदान ओर उसके पाप के बारे मे बताया की जंगल का ठेका लेकर उसे कटवाना । बाँस, सागवान, चंदन को उगाना फिर उसे काटकर व्यवसाय करने वाले को वनकर्म का पाप लगता है । उँट, बैल, गधा को भारी काम या बोझ लादना, उसे भाड़ी कम्मे का पाप लगता है । माइन्स का व्यवसाय, कुंआ खोदना, पत्थर का व्यवसाय, सुरंग खुदाना इस मे फोड़िकम्मे का पाप लगता है । अगर नया घर बनाओ तो उसमे कम से कम एक वर्ष तक जमीकंद नही बनाना चाहिए और जमीकंद का पूर्णतया त्याग करना चाहिये जिसके प्राश्चित से उस का पाप कर्म कम लगता है । हाथी के दांत, सिल्क का व्यवसाय करने से दंतकम्मे का पाप लगता है । एक शर्ट सिल्क के कपड़े मे कम से कम 40000 किट को उबाला जाता है तब जाकर सिल्क का कपड़ा बनता है । लाख का चुड़ा त्रसकय के जीवो की हिंसा होती है उसमे लखदनी कम्मे का पाप लगता है । मधु, शराब, शहद, मक्क्न आदि मे रसदानी कम्मे का पाप लगता है । मोरपँख का हमे व्यवसाय नहीं करना चाहिए, और अपने अधीनस्थ कर्मचारी से अत्यधिक श्रम नही करवाना चाहिए ।

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