भारतीय ज्ञान परम्परा विषयक दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का समीक्षात्मक विश्लेषण किया गया

रतलाम 23 फरवरी । शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, रतलाम में वैश्वीकरण के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परम्परा की भूमिका विषय पर आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी की समीक्षा आयोजन समिति व परामर्श समिति द्वारा की गयी जिसमे ये तथ्य सामने आये की यह संगोष्ठी ज्ञान, चिंतन और संवाद का सशक्त मंच बनकर उभरी। इस संगोष्ठी में देश-विदेश से लगभग 600 प्रतिभागियों का पंजीयन हुआ, 350 से अधिक शोध पत्र प्राप्त हुए तथा 100 से अधिक शोध पत्रों का ऑनलाइन एवं ऑफलाइन माध्यम से प्रभावी प्रस्तुतीकरण किया गया, जो इस आयोजन की अकादमिक गरिमा और व्यापक सहभागिता को दर्शाता है।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों डीआरएम अश्विनी कुमार, श्री प्रदीप खरे एवं डॉ. वाय.के. मिश्रा द्वारा दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। प्रथम दिवस संगोष्ठी समन्वयक डॉ. मणिक डांगे ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को जीवन मूल्य-आधारित समग्र दृष्टि बताते हुए इसकी आधुनिक संदर्भों में उपयोगिता स्पष्ट की तथा डॉ. पवन मिश्रा, डॉ. चाँद किरण सलूजा ने ऑनलाइन अपने विचार व्यक्त किए ।
मुख्य वक्ता डीआरएम अश्विनी कुमार, डॉ. प्रदीप खरे, मुख्य अतिथि डॉ. वाय.के. मिश्रा ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को जीवनमूल्य-आधारित समग्र दृष्टि बताते हुए कार्यक्रम को सम्बोधित किया । प्राचार्य डॉ. मंगलेश्वरी जोशी ने संगोष्ठी को नवचिंतन का प्रेरक मंच बताते हुए सभी वक्ताओं के विचारों को ज्ञानवर्धक बताया।
द्वितीय दिवस पर डॉ. कल्पना सिंह, डॉ. मुनीरा हुसैन ने ऑनलाइन तथा वक्ता डॉ. विनोद शर्मा ने संगोष्ठी को सम्बोधित किया। समापन महापौर प्रहलाद पटेल तथा वाणिज्य महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. राकेश माथुर के आतिथ्य में सम्पन्न हुआ।
परिणाम स्वरुप,यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परम्परा की वैश्विक प्रासंगिकता को प्रभावी रूप से स्थापित करने में सफल रही। व्यापक सहभागिता, उच्च स्तरीय शोध प्रस्तुतियों और विचारोत्तेजक व्याख्यानों ने अकादमिक विमर्श को समृद्ध किया। प्रतिभागियों में शोध के प्रति नवीन उत्साह जागृत हुआ तथा परंपरा और आधुनिकता के समन्वय की दिशा सुदृढ़ हुई। यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने, शोध को प्रोत्साहित करने तथा नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और प्रेरक पहल सिद्ध हुई।
भविष्य में यह संगोष्ठी भारतीय ज्ञान प्रणाली पर अंत:विषयी शोध, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और पाठ्यक्रम विकास को गति देगी। पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण, नवाचार और व्यावहारिक अनुप्रयोग के नए आयाम खुलेंगे। युवा शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी से यह पहल वैश्विक ज्ञान समुदाय में भारत की बौद्धिक उपस्थिति को सशक्त करेगी।