रतलाम । नीमचौक स्थानक, रतलाम पर विषय लोगस्स की महिमा के बारे में प्रवचनकार आगमज्ञाता डॉ समकित मुनि जी मसा ने धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि लोगग्स के पाठ से जीवन निर्माण के तीन सूत्र पहला सही समझ दूसरा उच्च श्रेणी की समाधि और तीसरा मन चंद्रमा जैसा निर्मल बने ।
चौथा सूत्र है
आईच्चेसु अहियँ पयासयरा अर्थात तीर्थंकर सूर्य से भी अधिक प्रकाशमान है । सूर्य और तीर्थंकर की अनेक विशेषताएं है वह स्वंय-पर प्रकाशित होते है और करते है, अर्थात स्वंय भी प्रकाशित होते है और दूसरों को भी प्रकाशित करते है।
तीर्थंकर जिन्नानन जावयणम मतलब स्वंय जीतने बुद्धानम बोहियानम दूसरों को जिताने वाले होते है, तिन्नानम तारायानम मतलब स्वंय तिरने वाले और दूसरों को तिरने वाले एंव बुद्धानम बोहियानम मतलब जो स्वंय प्रकाशित है और औरो को प्रकाशित करते है।
अगर अपनी तिजोरी फूल हो गई हो तो दूसरों की तरफ भी नजर दौड़ा लेना, दूसरों की तिजोरी को भी फूल करने का प्रयास करो। क्योंकि ओवरलोडिंग हर चीज की बुरी है।
खुद के घर में उजाला हो जाए तो जिनके घर में अँधेरा है उन्हें रोशन करने का प्रयास करो।
आप दिया बाती मंदिर में लगाते है अरे ईश्वर तो स्वंय प्रकाशमान है उसे आपके दीपक की जरूरत नही है। इस दुनिया में घी में घी डालने वाले बहुत मिल जाएंगे। घर में जँवाई आए मेहमान आए तो भोजन के आखिर में और अधिक खिलाने की मनुहार करते हो चाहे फिर सामने वाले को बदहजमी हो जाए। जिसको जरुरत है उसको दो।
मैने तो मेहनत और भाग्य से हासिल कर लिया वो दूसरों को भी हासिल हो ऐसा प्रयास करो।
दीपावली के त्यौहार के पहले किसी के घर में शोक हो जाए तो आप उसके घर मिठाई लेकर जाते क्योंकि आप जानते हो की शोक वाले घर मिठाई नही बनेगी तो आप उनका शोक तुड़वाने के लिये मिठाई ले जाते हो।
इस सोच को थोड़ा और उदार बनाओ, की यदि मेरा सामर्थ्य है तो दूसरों को भी सामर्थ्यवान बनाऊं। जिनशासन उदारवादी है जँहा जँहा उदारता खत्म होती है वँहा वँहा उपद्रव शुरू हो जाते है ।
बहुत से श्रावक श्राविका यह नियम कर लेते है की हमारे सम्प्रदाय के संत सती को ही हम गौचरी प्रदान करेंगे, सिर्फ उनके ही प्रवचन सुनेंगे सिर्फ उनके ही स्थानक में जाएंगे । जब जिनशाशन उदारवादी है तो उस जिनशासन को मानने वाले इतने कट्टर क्यों।
हमने अपने आपको बहुत संकुचित कर लिया है हम कहते है की में दिवाकरजी का हुँ, में राम गुरु का, पन्ना गुरु का, श्रमण संघ का तेरापंथ का हुँ लेकिन कोई यह नही कहता की में जिनशाशन का हुँ भगवान महावीर का हुँ । जो भगवान महावीर को मानेगा वो सबकी आराधना कर लेगा। अपने आप को ब्राड माइंडेड बनाए नैरो माइन्डेड़ नही ।
लेकिन यदि आप व्यवसाय करते हो औऱ आपका पडौसी दुकानदार आपसे पुछ ले की ये माल कँहा से लाए मुझे भी बता दो, तो क्या उसे बताओगे कदापी नही।
तीर्थंकर कितने उदार और दयावान है स्वंय जिस रास्ते पर चलकर मोक्ष गए वो ही रास्ता हम सबको भी बताकर गए वो चाहते है की सबको मोक्ष प्राप्त हो।
तीर्थंकर बहुत उपकारी होते है इसीलिये तीर्थंकर को अनन्त उपकारी कहा गया है।।
जो प्लस है उसको माइनस करना सीखो, क्योंकि गणित की भाषा में प्लस प्लस जोड़ते है तो प्लस ही आता है लेकिन आध्यात्म की भाषा में यदि प्लस को माइनस करना सीख गए तो प्लस ही प्लस होगा । जिसकी प्रवृत्ति प्लस प्लस करने की होती है वो अंत में माइनस हो जाता है ।
प्रयास करो की जो धन मेहनत व परिश्रम से कमाया है । 18 पाप करके कमाया है उसका सदुपयोग करो ।
धन के चार हिस्से होना चाहिये पहला हिस्सा 25 प्रतिशत बचत, दुसारा 25 प्रतिशत व्यवसाय में तीसरा 25 प्रतिशत परिवार और चौथा हिस्सा 25प्रतिशत परोपकार में ख़र्च करो यदि इस प्रणाली से धन को बाँटना शुरू किया तो कभी किसी बात की कमी नही रहेगी।
पत्थर को उसी पेड़ पर मारते है जो फल देता है इसी प्रकार याचक उसी से मांगता है जो दे सके। कोई कुछ मांगने आया है तो उसे उसकी आवश्यतानुसार और आपके सामर्थ्य अनुसार अवश्य देना चाहिए।
इसके लिए उदारता होना चहिये और लोगस्स के पास से उदारता में अभिवृद्धि होती है।
पूज्य गुरुदेव समकितमुनि जी ने पिछले दिनों श्रवण चारित्र पर प्रवचन दिए थे, और प्रेरणा दी थी की आज भी कई श्रवणकुमार है और ऐसे श्रवण कुमारों का सम्मान होना चाहिए जिससे समाज को प्रेरणा मिले, अत: दिनांक 27 मार्च के दिवाकर संघ के ऐसे सदस्य जो शादी के बाद कम से कम 30 साल से अपने माता पिता के साथ रहकर उनकी सेवा कर रहे ऐसे परिवारों का सम्मान श्रीसंघ के द्वारा किया जाएगा। जिसके लाभार्थी शांताकुमारी इंदरमलजी जैन परिवार होंगे।