” वो महावीर भगवान कठे”

(तर्ज- वो महाराणा प्रताप कठे…..)

कुण्डलपुर में जनम लिदो,
वो जन-जन रो भगवान कठे..
मा त्रिशला थारो वीर कठे…
वो जेन धरम री जान कठे…
वो आन बान ओर शान कठे …
वो महावीर भगवान कठे….।।
कुण्डलपुर में….
वो महावीर …..

चौदह सपना जदी देख्या तो, माँ त्रिशला
देखो हरसाई…..
जन्म थारो वेता ईन, धन रि वरखा वेवा
लागी…..
भरग्या सारा खजाना ही, जदी वर्धमान
थारो नाम पड़ियो …..
था निडर और साहसी अतरा , बालपणा
में महावीरा …..
त्रिशला नंदन सिद्धार्थ कुल-2, वो महावीर
भगवान कठे,,,,,,
वो जैन धरम री जान,,,,,,(1)

जब तक मात-पिता जिये , मैं संयम को
ना लूंगा…..
यशोदा के संग ब्याव किदो ,पुत्री
प्रियदर्शना जन्म लिदो….
जब मात पिता ने देह त्यागी, वो अपनी
प्रतिज्ञा से मुक्त हुए…..
छोड़ दियो सारो राजपाठ ,जंगल की ओर
किदो प्रस्थान…..
मात पिता री बात माने-२, कलयुग में असो…..
पूत कठे,,
वो जैन धरम री जान,,,,,,,,,,,,,,(2)

जणी गेले कोई नी जाता, वणी गेले वी तो
चलता ग्या…..
चंडकौशिक नामक विषधर सु , वी तो
बिल्कुल भी नी डरिया…..
फुकार लगाई विषधर ने, और डंक
लगायो अंगूठे पर ……
बहा करके दूध की धारा, चंडकौशिक का
उद्धार किया ..……
जणी चंडकौशिक ने तारियो है-2, वो
तारणहार अबे कठे,,,,,,
वो जैन धर्म की जान,,,,,,(3)

सुपड़े में बासी बाकुले, लेकर बैठी थी
चंदना…..
तीन दिवस की भूखी थी, खाने का कर
रही थी विचार
प्रभु को अपने द्वार देख , मन मयूर के
जैसे नाच उठा…..
चंदना के हाथों कर पारणा ,चंदना का
उद्धार किया……
ओ जणी नारी जाति ने तारियो है-2, वो
समाज सुधारक आज कठे,,,
वो जैन धरम री जान …….(4)

संगम देव ने प्रभु को, बीस उग्र उपसर्ग
दिए……
प्रभु साधना में थे लीन,उसके आगे वोतो
ना झुके……
चरणा में पड़ग्यो वीरा रे, माफ करो मने
प्रभु…….
इंद्र के मुख सू गुणगान सुण, मु संगम देव
बौखलाया……
देवता भी जणीरा गुणगान करें-२, वो
केवल ज्ञानी आज कठे,,,,,,,
वो जैन धरम री जान कठे……(5)

केवलज्ञान के नजदीक, जब प्रभु पहुंचने
थे वाले …..
उससे पहले उस ग्वाले ने, कानों में गाड़
दिए किले…….
फिर भी रहे मोन वीर प्रभु, ना बोले कुछ
उस ग्वाले से…..
चीख पड़े धरती अंबर जब किले वेद ने
काड़े……
पापी सु पापी ने क्षमा किदो-२, वो
क्षमाधारी आज कठे,,,,,,
वो जैन धरम री जान……..(6)

गाथापति आनंद कामदेव, चुल्लनी पिता
ओर सुरादेव……
पुनिया श्रावक की सामायिक, ओर राजा
श्रेणिक की भक्ति…….
महावीर के श्रमोपासक में, आते है ये तो
सभी……
जो खुद तरे ओर सब ने तारे -२, वो
तारणहार अबे कठे,,,,,
वो जैन धरम री जान ……(7)

ऋजु बालुका के तट पर, महावीर को
केवलज्ञान हुआ……
बोहत्तर वर्ष की आयु में, प्रभु महावीर का
निर्माण हुआ.……
वो दिव्य भास्कर अस्त हुआ, संसार
अंधकार में डूब गया…
धरती सु एक दिव्य ज्योति, देखो भाई
विलीन हुई ….
अणी धरती पे जणी अवतार लीदो-२,वो
अवतारी अबे कठे,,,
वो जैन धरम री जान ……..(8)

आज मनख रे हिवड़ा में, क्रोध मान माया
घुस आया…..
मनख ने मनख नी चावे, भाई ने भाई नी
चावे…..
मां बाप ने घर सु काड़ीरा, लुगाई रे चारे
लागी रा……
थानक – मंदिर ने भूली रा, टी.वी सिनेमा
ती जिविरा….
अणी सुनिल मेहता “कान्हा” ने-२,चरणा
में राखो जनम जनम,,,,
वो जैन धरम री जान कठे,,,,,,,,,(9)
मा त्रिशला थारो………
वो महावीर भगवान,,,,,,,,,,,,

✍🏻 लेखक
सुनिल मेहता “कान्हा”
बड़ीसादड़ी (राज.)
मो- 9928605662

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