बडती मंहगाई,बढते टेक्स – कारण- पक्ष, विपक्ष और मीडिया की कमजोर होती भूमिका

रतलाम (शरद जोशी)। शहर के बाजारों में रौनक आज भी दिखाई देती है, लेकिन यह रौनक अब वास्तविक समृद्धि की नहीं, बल्कि संघर्ष के बीच टिके रहने की मजबूरी की कहानी कहती है। दुकानों में बैठे व्यापारी मुस्कुराते जरूर हैं, लेकिन उनके माथे पर बढ़ते करों, नियमों की जटिलता और प्रशासनिक दबाव की लकीरें साफ पढ़ी जा सकती हैं।
आज का व्यापारी केवल व्यापार नहीं कर रहा, बल्कि वह एक साथ कई मोर्चों पर लड़ रहा है— जीएसटी की जटिल प्रक्रियाएं, बार-बार बदलते नियम, नगर निगम के कर, सम्पति कर, जलकर,लाइसेंस फीस और अन्य प्रशासनिक औपचारिकताएं।
लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि व्यापारी की लड़ाई आधी इसलिए हार जाती है, क्योंकि वह खुद बिखरा हुआ है। जनता मौन है, पक्ष, विपक्ष, और मीडिया की भूमिका जन अनुरुप नजर नही आती इसका खामियाजा नेतृतव विहिनआम जनता भुगत रही है।
शहर में व्यापारिक संगठनों की कमी नहीं है—हर बाजार, हर क्षेत्र में अलग-अलग संगठन मौजूद हैं। लेकिन जब बात किसी बड़े मुद्दे की आती है, तो यह संगठन एक मंच पर खड़े नजर नहीं आते।
कोई ज्ञापन देने तक सीमित रह जाता है,
कोई केवल फोटो और प्रचार में व्यस्त रहता है,
तो कोई आपसी खींचतान में उलझा रहता है। यही हालत कर्मचारी और पत्रकार संगठनों की है। यही बिखराव शासन, प्रशासन के लिए सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। जब आवाजें अलग-अलग हों, तो असर खत्म हो जाता है। जब नेतृत्व कमजोर हो, तो निर्णय एकतरफा हो जाते हैं।
और जब विरोध बंटा हुआ हो, तो करों का बोझ बढ़ाना आसान हो जाता है।
पर इस पूरी कहानी का सबसे गंभीर और अनदेखा पहलू है—जनता पर इसका सीधा असर।
व्यापारी पर लगाया गया हर अतिरिक्त कर, हर बढ़ा हुआ शुल्क अंततः कीमतों में जुड़ जाता है।
दुकान में बैठा व्यापारी अपनी लागत निकालने के लिए मजबूर होता है—और वही लागत धीरे-धीरे आम आदमी की थाली तक पहुंच जाती है।
आज दाल महंगी है, सब्जी महंगी है,दवाई और इलाज मंहगा है,मंहगी बिजली, मंहगा पेट्रोल डीजल,दूध और तेल तथा आम जरुरत की चीजें तक आम आदमी की पहुंच से दूर होती जा रहे हैं।गरीब आदमी की जरुरत घासलेट तो गायब है., आम नागरिक यह समझ ही नहीं पाता कि यह महंगाई केवल बाजार की चाल नहीं, बल्कि व्यवस्था की परतों में छिपा हुआ परिणाम है—जहां व्यापारी दब रहा है और उसी दबाव का भार जनता पर गिर रहा है।
सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि व्यापारी वर्ग तब तक एकजुट नहीं होता, जब तक स्थिति हाथ से निकल नहीं जाती।
छोटी-छोटी आवाजें उठती हैं, लेकिन वे असरदार आंदोलन में बदलने से पहले ही थम जाती हैं।
आज जरूरत केवल विरोध की नहीं है—
संगठित, स्पष्ट और मजबूत विरोध की है।
जरूरत है कि व्यापारी अपने व्यक्तिगत और संगठनात्मक मतभेदों को किनारे रखकर एक साझा मंच तैयार करें।
एक ऐसी आवाज बने जो केवल औपचारिकता न हो, बल्कि निर्णयों को प्रभावित करने की ताकत रखती हो।
क्योंकि सच्चाई यही है।
अगर व्यापारी मजबूत होगा, जनता संगठित होगी और मीडिया जागरूक होगा तो बाजार संतुलित रहेगा।
और अगर बाजार संतुलित रहेगा, तो ही जनता को राहत मिलेगी।
कमजोर विपक्ष,सतारुढ दल के नेता और कार्यकर्ताओं की नैतिक जिम्मेदारी , और कर्तव्य से भटकता मीडिया वर्ग भी ‌इन सबके लिए जिम्मेदार हे।
बढता करों का बोझ जब तक कम नही होगा तब तक जनता जनार्दन को राहत मिलने वाली नही है।
मंहगाई रोजमर्रा की बनी जंग
मंहगाई आज केवल एक आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जंग बन चुकी है। रसोई से लेकर रोजगार तक, हर मोर्चे पर बढ़ती कीमतें जीवन को बोझिल बना रही हैं।
सरकार इसके पीछे वैश्विक कारण—तेल की कीमतें, युद्ध, अंतरराष्ट्रीय बाजार—गिनाती है। तर्क अपनी जगह सही हो सकते हैं, लेकिन सवाल यह है कि इन परिस्थितियों से राहत देने के लिए ठोस कदम कहाँ हैं?
विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर है, लेकिन उसकी भूमिका भी केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नजर आती है। जनता को राहत देने के लिए कोई स्पष्ट रोडमैप या वैकल्पिक नीति सामने नहीं आती।
सबसे चिंताजनक स्थिति मीडिया की है। जिस मीडिया से उम्मीद थी कि वह इस मुद्दे को मजबूती से उठाएगा, वह अक्सर बहसों और राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित रह जाता है। जमीनी हकीकत, आम आदमी की पीड़ा और समाधान की खोज—इन सब पर अपेक्षित गंभीरता दिखाई नहीं देती।
नतीजा यह है कि मंहगाई एक ऐसा मुद्दा बन गया है, जिसमें कारणों की चर्चा अधिक है, समाधान की कमी है, और आम आदमी इस पूरी बहस में सबसे कमजोर कड़ी बनकर रह गया है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *