उपादान और निमित्त के सिद्धांत को रोटी के उदाहरण से समझाया, कर्म के अनुसार बदलते हैं संबंध


रतलाम। स्टेशन रोड स्थित श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित प्रवचन के दौरान पूज्य मुनि 108 श्री निर्णय सागर जी महाराज ने साधना, पारणा और कर्म सिद्धांत पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि साधक को पारणा (पारण) और आराधना करते समय बिना आग्रह, बिना अपेक्षा और पूर्ण संतभाव से कार्य करना चाहिए। साधना में किसी भी प्रकार का विघ्न आने पर अपने संकल्प को नहीं तोड़ना चाहिए।
मुनि श्री ने उपादान और निमित्त के सिद्धांत को सरल भाषा में समझाते हुए कहा कि किसी भी कार्य के पीछे दो कारण होते हैं—उपादान कारण और निमित्त कारण। उपादान वह है जो स्वयं कार्य को उत्पन्न करता है, जबकि निमित्त सहायक कारण होता है। इसे रोटी के उदाहरण से समझाते हुए उन्होंने कहा कि आटा रोटी बनने का उपादान कारण है, जबकि पानी, आग और बनाने वाला व्यक्ति निमित्त कारण हैं। आटे के बिना रोटी नहीं बन सकती, जिससे स्पष्ट होता है कि उपादान का महत्व सर्वोपरि है।
उन्होंने कहा कि जीवन में भी व्यक्ति के अपने कर्म ही मुख्य कारण होते हैं, जबकि अन्य परिस्थितियां केवल निमित्त मात्र होती हैं। इसलिए किसी भी परिस्थिति में अपने आत्मबल और साधना को नहीं छोड़ना चाहिए।
कर्म के अनुसार बदलते हैं मित्र और शत्रु
मुनि श्री ने कहा कि संसार का स्वभाव ही परिवर्तनशील है और यह सब कर्मों के उदय का परिणाम है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जब पुण्य का उदय होता है तो शत्रु भी मित्र बन जाते हैं और जब पाप का उदय होता है तो अपने भी पराये हो जाते हैं। भगवान राम के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वनवास, सीता हरण, सुग्रीव और हनुमान से मिलन—ये सभी घटनाएं कर्म के उदय का परिणाम थीं।
उन्होंने कहा कि हमें छोटी-छोटी बातों में उलझकर चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि यह समझना चाहिए कि जो भी हो रहा है, वह हमारे कर्मों का फल है। इसलिए समता भाव बनाए रखना ही सच्ची साधना है।
णमोकार मंत्र की आराधना से आत्मबल की प्राप्ति
मुनि श्री ने प्रवचन में णमोकार मंत्र की महिमा बताते हुए कहा कि इसकी आराधना से आत्मबल और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। साधक को चाहिए कि वह मंत्र जाप में पूर्ण रूप से लीन हो जाए और समर्पण भाव से साधना करे।
पार्श्वनाथ भगवान के जीवन से लें प्रेरणा
उन्होंने भगवान पार्श्वनाथ के जीवन का उल्लेख करते हुए बताया कि उन्होंने कठोर उपसर्गों को सहन करते हुए भी क्षमा और धैर्य का मार्ग नहीं छोड़ा। अंततः उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। इससे यह शिक्षा मिलती है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और साधना बनाए रखनी चाहिए। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित रहे और धर्म लाभ प्राप्त किया।