
लेखक – विनीता ओझा
भारत विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है जिसकी बहुरंगी विविधता और अपनी एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है ।वंदे मातरम् इस ऐतिहासिक विरासत का वह भाग है जिसमें मातृभूमि के प्रति भक्ति भी है, शक्ति भी है। यह भारत का स्वाभिमान भी है आत्म सम्मान भी है तथा अभिमान भी है। यह राष्ट्र की चेतना भी है तथा साधना भी है। इसी अमर घोष ने स्वतंत्रता सेनानियों को एकता एवं बलिदान के लिए प्रेरित किया जो आंदोलन में जन चेतना की मुखर आवाज के रूप में पूरे भारतवर्ष में फैल गई। वंदे मातरम् ,राष्ट्र को मात्र भौगोलिक इकाई ना मानते हुए उसे राष्ट्र की चेतना, आत्मा की दिव्य शक्ति मानकर देखता है। श्रीअरविंद के अनुसार यह केवल एक गीत नहीं बल्कि मातृभूमि की रक्षा और उत्थान के लिए “शक्ति” का आह्वान करने वाला मंत्र है। यह भारत की सामूहिक चेतना और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वतंत्रता सेनानियों को ऊर्जा और प्रेरणा प्रदान करता था ।
इस गीत की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1875 में की थी तथा अपने उपन्यास “आनंद मठ”में 1882 में प्रकाशित किया था। यह गीत संस्कृत और बंगाली का मिश्रण है जो मातृभूमि की वंदना करता है तथा यह वह राष्ट्रवाद का प्रतीक है जो अंग्रेजों के खिलाफ सर्वाधिक सशक्त आव्हान बन गया। श्रीअरविंद ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद भी किया । इसमें छह अंतरे हैं ,लेकिन राष्ट्रीय गीत के रूप में इसके प्रथम दो पदों को अपनाया गया। 14 अगस्त 1947 की संविधान सभा की प्रथम बैठक इसी गीत से प्रारंभ हुई थी । इसके पूर्व 1896 के कोलकाता अधिवेशन में रविंद्र नाथ टैगोर ने सार्वजनिक रूप से इसे गाया था तथा 24 जनवरी 1950 को इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया। वंदे मातरम् मात्र राष्ट्रीय गीत नहीं अपितु स्वतंत्रता आंदोलन की प्राण वायु, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रथम उद्घोषणा और भारत माता के प्रति अटूट भक्ति व समर्पण के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में देखा जाता है ।यह गीत राष्ट्र के जागरण का मूल मंत्र व भारतीय संस्कृति व एकता का प्रतीक है जो हिंदुस्तान को भूखंड नहीं बल्कि मां के रूप में देखता है। यह भारत के पुनर्जन्म की वह ऋचा है जो पीढ़ियों को देशभक्ति से जोड़ता है ।
श्रीअरविंद ने इसे स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख उदघोष बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके अनुसार वंदे मातरम् में अंतर्निहित आध्यात्मिक शक्तियां थी जो लोगों की सामूहिक चेतना को जागृत करने में सक्षम थी ।उनका मानना था कि वंदे मातरम् का गान राजनीतिक कार्य नहीं बल्कि आध्यात्मिक कार्य था जिसका उद्देश्य जनता की एक गहरी एवं साझा पहचान से देश को जोड़ना था ।स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वंदे मातरम् ने राष्ट्र की सामूहिक भावना को समाहित किया एवं स्वतंत्रता के लिए एकजुट करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। आज भी यह गीत भारतीयों के हृदय में देश प्रेम और सम्मान की भावना को जीवंत रखता है। जो देश के गौरवशाली इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा है। वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण होने पर इसे विकसित एवं समृद्ध भारत 2047 के संकल्प एवं सृजन में महत्वपूर्ण प्रेरणा के रूप में देखा जा रहा है। वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने का जश्न मनाने के लिए यह एक राष्ट्रीय पहल है। इसमें हमारी भागीदारी हमें आत्म बल प्रदान करेगी एवं राष्ट्र प्रेम की भावना भी प्रज्वलित करेगी । इस गीत की अमर भावना भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इसकी ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी भूमिका को याद करना है।
विनीता ओझा
उच्च माध्यमिक शिक्षिका,
जवाहर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय रतलाम