दान, त्याग और सेवा से ही आत्मशुद्धि संभव: मुनि श्री निर्णय सागर जी महाराज

रतलाम के चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन, वैयावृत्य दान को बताया श्रेष्ठ साधन

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रतलाम । स्टेशन रोड स्थित श्री चंद्रप्रभ दिगंबर जैन मंदिर में विराजमान मुनि श्री 108 निर्णय सागर जी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि दान, त्याग और सेवा के माध्यम से ही आत्मा की शुद्धि संभव है। उन्होंने कहा कि धर्म केवल बाहरी क्रियाओं का नाम नहीं है, बल्कि उसके पीछे शुद्ध भावना और निस्वार्थ भाव होना आवश्यक है।
मुनि श्री ने अपने प्रवचन में वैयावृत्य दान का विशेष महत्व बताते हुए कहा कि जो मुनि संसार का परित्याग कर तपस्या में लीन हैं, उनकी सेवा और उन्हें आहार देना सर्वोत्तम दान है। यह दान कर्मों की निर्जरा (क्षय) और संवर (नियंत्रण) का प्रमुख साधन बनता है।

किसान के उदाहरण से समझाया धर्म का महत्व
प्रवचन के दौरान मुनि श्री ने किसान का उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे किसान खेत में बीज बोता है और उसका उद्देश्य अंततः अनाज प्राप्त करना होता है, उसी प्रकार धर्म के कार्यों का फल भी समय के साथ मिलता है। प्रारंभ में परिणाम दिखाई नहीं देता, लेकिन धैर्य और श्रद्धा से किया गया धर्म अंततः पुण्य और आत्मकल्याण का कारण बनता है।

निस्वार्थ भाव से करें दान
उन्होंने कहा कि आज के समय में लोग दान के पीछे किसी न किसी प्रकार की अपेक्षा रखते हैं, जैसे सम्मान या लाभ। लेकिन सच्चा धर्म वही है, जिसमें कोई स्वार्थ न हो। दान का उद्देश्य केवल आत्मा की शुद्धि और कर्मों का क्षय होना चाहिए।

गृहस्थ जीवन में धर्म का महत्व
मुनि श्री ने कहा कि प्रत्येक गृहस्थ को अपने जीवन में अभिषेक, पूजन, स्वाध्याय, गुरु सेवा, दान और तप को अपनाना चाहिए। इनका पालन न करने पर जीवन धर्म से दूर हो जाता है और आत्मिक उन्नति संभव नहीं हो पाती। उक्त बात अपने प्रवचन श्रृंखला में कहीं।

समापन
प्रवचन के अंत में मुनि श्री ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे धर्म को समझकर, निस्वार्थ भाव से दान और सेवा करें, जिससे जीवन में शांति और आत्मकल्याण प्राप्त हो सके। प्रवचन में समाज जन, श्रावक संघ, महिला एवं पुरुष बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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