


झुमरीतिलैया। जैन संत प पूज्य गुरुदेव मुनि श्री 108 धर्म सागरजी महाराज एवं मुनि श्री 108 भाव सागरजी महाराज के पावन सानिध्य में आज दि 16/5/26 को झुमरी तिलैया के बड़े मंदिर जी में संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्या सागर जी महामुनिराज के गुरु आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर जी महामुनिराज का समाधि स्मृति महोत्सव श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ चित्र अनावरण दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र अर्पण के साथ हुआ ।इस अवसर पर सुबोध आशा जैन गंगवाल के निर्देशन में संगीतमय गुरु पूजन हुई। पूज्य गुरुदेव द्वय के द्वारा अपने मंगल प्रवचन में कहा गया कि अपने लिए जो जीते हैं उनका मरण होता है परंतु जो दूसरों के कल्याण करने के साथ स्वयं का कल्याण करते हैं उन्हें लोग स्मरण करते हैं। सभी धर्म जीने की कला सिखाते हैं परंतु जैन धर्म मरने की कला सिखाता है। दुनिया मृत्यु से भयभीत रहती है,किंतु समाधि रूपी मृत्यु को श्रेष्ठ माना गया है। आगे मुनि श्री 108 भाव सागरजी जी ने कहा कि संत लोग कषाय की और काय की सल्लेखना करते हुए मृत्यु को महोत्सव बना देते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि शरीर तो एक दिन छूटना ही है, किंतु आत्मा की सुरक्षा एवं कल्याण के लिए सल्लेखना ग्रहण की जाती है। दीक्षा भी सल्लेखना की साधना हेतु ली जाती है, जिसमें क्रमशः अन्न-जल का त्याग एवं निर्जल उपवास की साधना की जाती है।
पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री 108 ज्ञान सागरजी मुनीराज ने अपने शिष्य को इतना ज्ञान दिया कि आज पू गुरुदेव श्री 108 विद्यासागर जी महामुनिराज का नाम और अवदान सारे जगत में विख्यात है।