- ब्रिटेन ने 106 साल बाद लौटाई जैन समाज की धरोहर: 2000 प्राचीन पांडुलिपियाँ भारत वापस
- Wellcome Collection ने मानी ऐतिहासिक भूल – “अधिग्रहण मूल मालिकों के हितों के विरुद्ध था”
- हस्तलिखित कल्पसूत्र, चिकित्सा ग्रंथ एवं दुर्लभ चित्रित शास्त्रों की वापसी से जैन समाज में हर्षोल्लास
- Institute of Jainology और University of Birmingham करेंगे डिजिटल संरक्षण

फोटो कैप्शन: लंदन के British Museum में आयोजित समारोह में Wellcome Collection की निदेशक द्वारा जैन समाज के वरिष्ठ प्रतिनिधियों को लाल वस्त्र में लिपटी प्राचीन पांडुलिपि सौंपते हुए। सभी प्रतिनिधियों ने नमोस्कार मुद्रा में इस ऐतिहासिक क्षण का स्वागत किया।
लंदन/इंदौर (राजेश जैन दद्दू)। अंग्रेजी औपनिवेशिक शासनकाल में भारत से ले जाए गए लगभग 2000 प्राचीन जैन पांडुलिपियों की 106 साल बाद ऐतिहासिक घर वापसी हुई है। लंदन स्थित प्रसिद्ध Wellcome Collection ने इन अमूल्य ग्रंथों को जैन समाज को आधिकारिक रूप से सौंपने का निर्णय लिया है। इस अवसर को “Cultural Restoration: Returning of Jain Manuscripts – A Historic Partnership” नाम दिया गया।
क्या है इन पांडुलिपियों का महत्व?
ये सदियों पुरानी हस्तलिखित पांडुलिपियाँ मात्र किताबें नहीं, बल्कि जैन धर्म की जीवंत धरोहर हैं। इनमें शामिल हैं:
- हस्तलिखित कल्पसूत्र – भगवान महावीर के जीवन चरित्र एवं चातुर्मास विधान वाले।
- दुर्लभ चिकित्सा ग्रंथ – आयुर्वेद एवं जैन चिकित्सा पद्धति के प्राचीन सूत्र।
- अद्भुत चित्रकारी वाले शास्त्र – सोने-चांदी की स्याही से बने मिनिएचर पेंटिंग वाले ग्रंथ।
- आगम एवं सिद्धांत ग्रंथ – आचार्यों द्वारा स्वयं लिखित मूल प्रतियाँ।
कैसे गई थीं ये ग्रंथ विदेश?
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार वर्ष 1919 में इन पवित्र ग्रंथों को बेहद कम कीमत पर खरीदा गया था। इनमें से अधिकांश पांडुलिपियाँ उस प्राचीन जैन ज्ञान भंडार से लाई गई थीं जो वर्तमान पाकिस्तान क्षेत्र में स्थित एक जैन मंदिर में सुरक्षित थीं। औपनिवेशिक काल में शोध के नाम पर इन्हें विदेश ले जाया गया।
ब्रिटेन ने मानी अपनी गलती
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि Wellcome Collection ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है कि यह अधिग्रहण “मूल मालिकों के हितों के विरुद्ध” हुआ था। यानी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर यह स्वीकार किया गया कि यह धरोहर जैन समाज की ही थी और उसे वापस करना न्यायसंगत है।
आगे की योजना: डिजिटलीकरण एवं प्रदर्शन
Institute of Jainology, London के अध्यक्ष ने बताया कि अब इन अमूल्य ग्रंथों का संरक्षण University of Birmingham के सहयोग से किया जाएगा। इन्हें डिजिटाइज कर वैश्विक स्तर पर शोधार्थियों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी इस महान विरासत को देख-समझ सकें। भारत में भी इनकी प्रदर्शनी लगाने की योजना है।
समाज प्रवक्ता राजेश जैन दद्दू ने कहा कि सकल दिगम्बर-श्वेताम्बर जैन समाज* ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए कहा कि यह सिर्फ पांडुलिपियों की वापसी नहीं है, यह जैन धर्म के ज्ञान, संस्कृति, तप और हजारों वर्षों पुरानी संस्कृति सभ्यता के सम्मान की वापसी है। यह सिद्ध करता है कि जैन धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि उस ज्ञान में जीवित है जिसे आज पूरी दुनिया सम्मान दे रही है।