संत का भगवा वस्त्र परमार्थपूर्ण जीवन व लोकमंगल का प्रतीक है – स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वतीजी

अधिक मास में श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ महोत्सव की पूर्णाहुति – प्रसादी मंगलवार को

रतलाम 8 जून । संत भगवा वस्त्र किसी व्यक्ति, संगठन या सत्ता के प्रभाव में आकर नहीं धारण करते, बल्कि यह त्याग, तपस्या, सेवा और लोकमंगल का प्रतीक है। भगवा रंग सांसारिक मोह-माया से विरक्ति तथा ईश्वर और समाज के प्रति समर्पण का संदेश देता है। संत अपने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनकल्याण, धर्म, संस्कृति और नैतिक मूल्यों के संरक्षण के लिए जीवन समर्पित करते हैं। उनका उद्देश्य केवल आत्मकल्याण ही नहीं, बल्कि समाज में सद्भाव, करुणा, सत्य और आध्यात्मिक चेतना का प्रसार करना भी होता है। इसलिए भगवा वस्त्र त्याग और परमार्थपूर्ण जीवन का प्रतीक माना जाता है।
यह विचार महामण्डलेश्वर स्वामी चिदम्बरानन्द सरस्वतीजी महाराज ने दयाल वाटिका सैलाना रोड परश्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ महोत्सव के सातवें दिन व्यक्त किये । श्री हरिहर सेवा समिति मोहनलाल भट्ट परिवार एवं श्री कालिका माता सेवा मंडल ट्र्स्ट द्वारा आयोजित कथा के आरम्भ में आयोजक श्री मोहनलाल भट्ट, श्रीमती श्यामा भट्ट, सुनील भट्ट, महेंद्र भट्ट परिवार ने पोथी पूजन किया ।

सच्ची मित्रता का सर्वोत्तम उदाहरण-
कथा प्रसंग भगवान का विवाह एवं सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए स्वामीजी ने कहा कि सुदामा और भगवान कृष्ण की मित्रता भारतीय संस्कृति में सच्ची मित्रता का सर्वोत्तम उदाहरण मानी जाती है। यह मित्रता समाज को यह संदेश देती है कि सच्ची मित्रता धन, पद और वैभव पर नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, सम्मान और निस्वार्थ भाव पर आधारित होती है। भगवान भी अपने भक्त और मित्र के प्रेम को सर्वोच्च मानकर उसका सम्मान करते हैं। भगवान कृष्ण ने सुदामा की गरीबी नहीं, बल्कि उनके हृदय की पवित्रता को महत्व देकर मित्रता का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया।

पाप और अत्याचार ही अनर्थ के कारण –
जब भी जीवन में विचार – आचरण बिगड़ेगा तब आसुरी प्रवृति बढने लगती है । यही वजह होती है कि पृथ्वी पर पाप और अत्याचार का भार भी बढने लगता है जो कई विपदाओं और अनर्थ का कारण बनता है । अपने आचार विचार को यदि दूषित होने से बचाना है तो कथा, सत्संग और नाम सुमिरन करना चाहिए । कथा में आपको अपने मन को परमात्मा से जोड़े रखने के विभिन्न सौपान बताये जाते है, उनको अपनाने से आप भगवान और संत की निगरानी में रहेंगे ।

सुपर स्पेशिलिटी का अहम घातक –
स्वामीजी ने बताया कि हमारी संस्कृति में पारिवारिकता का भाव बहुत महत्वपूर्ण है । विवाद होते ही तब है, जब प्रेमभाव का स्थान अहमभाव ले लेता है । स्वयं में सुपर स्पेशिलिटी का जो अहंकार है, वो ही दुःख का मूल बन जाता है । परिवार में सभी के विचार को सम्मान दिया जाना चाहिए । घर परिवार की हर समस्या का समाधान प्रेमभाव में निहित है । कथा और सत्संग जैसे आयोजन न केवल परिवार में बल्कि समाज और राष्ट्र में भी परस्पर सामाजिक समरसता को बढ़ाने के कार्य में सेतु बनते है । इस दिशा में मोहनलाल भट्ट परिवार का रतलाम में योगदान अभूतपूर्व है ।

महात्मा की शरण स्वीकारे –
उन्होंने कहा कि श्रीमद् भागवत जी में महात्मा के लक्षणों की व्याख्या की गई है । जो दुसरे का दुःख देकर द्रवित हो जाए, वही तो महात्मा है । जो सभी के कल्याण का भाव रखे । जो भगवान के प्रति अगाध प्रेमभाव और समर्पण रखे और दूसरों से कपट रहित होकर व्यवहार करें । ऐसे महात्मा के दर्शन मात्र से अनंत कोटि फल मिलता है। शुकदेव जी महाराज ने परीक्षित को कथा श्रवण करवाते हुए शास्त्र श्रवण और महात्मा की महिमा बतलाई है । उन्होंने कहा है कि धर्म, साधना, भक्ति आदि भी समझ नहीं आए तो महात्मा की शरण स्वीकारने से कल्याण हो जाता है ।

स्वागत-वन्दन-अभिनंदन –
कार्यक्रम में महापौर प्रहलाद पटेल ने पूज्य स्वामीजी से आशीर्वाद प्राप्त किया । उनका आयोजन समिति अध्यक्ष मोहनलाल भट्ट परिवार द्वारा शाल – श्रीफल भेंटकर अभिनन्दन किया गया । यंहा विदुषी सुश्री अंजली जोशी, सनातन धर्म सभा अध्यक्ष अनिल झालानी, नवनीत सोनी, पतंजलि समिति जिला अध्यक्ष विशाल शर्मा, रत्नेश विजयवर्गीय, महेंद्र बोथरा, अनिल छाजेड, कमल पाटनी, डॉ.डी.सी.राठोड, प्रकाश सांवरिया ग्रुप, मेहँदी कुई बालाजी न्यास, आदि ने स्वागत किया । संचालन ने कैलाश व्यास एवं सुनील भट्ट किया ।

परम पुण्योदय का संयोग-
महापौर श्री पटेल ने कहा कि जो श्रीमद् भागवत कथा करवाते है, उनके पूर्वज भी प्रसन्न होकर आशीर्वाद बरसाते है । परिवार में सुख, समृधि और खुशहाली आती है । न केवल आयोजक बल्कि कथा के श्रोता को भी अमित पुण्य प्राप्त होता है । ऐसा परम पुण्योदय का संयोग यदि अधिक मास में मिल जाए तो उसकी महिमा का वर्णन करना कठिन है । भट्ट परिवार ने ऐसा सुखद संयोग रतलाम को देकर परमार्थ का कार्य किया है ।

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