आपसी प्रेम,सामंजस्य ओर सद्भाव ही जैन एकता के आधार- युवाचार्य महेन्द्र ऋषिजी

युवाओं को उपदेश देने की नहीं संवाद करने की जरूरत, चातुर्मास में होगा हर वर्ग को जोड़ने का प्रयास

भीलवाड़ा 17 जुलाई। धर्मनगरी भीलवाड़ा की पावनधरा पर पहली बार चातुर्मास करने जा रहे राष्ट्र संत आचार्य सम्राट पूज्य गुरूदेव श्री आनंदऋषिजी म.सा. के सुशिष्य ध्यानयोगी, युगपुरूष आचार्य भगवन पूज्य गुरूदेव डॉ. शिवमुनिजी म.सा. के आज्ञानुवर्ति श्रमण संघीय आगम रत्नाकर युवाचार्य भगवंत पूज्य महेन्द्र ऋषिजी म.सा. रविवार को चातुर्मासिक मंगलप्रवेश कर भूपालगंज स्थित शांतिभवन पहुचेंगे। मंगल प्रवेश से पूर्व शुक्रवार को मीडियाकर्मियों से संवाद के दौरान युवाचार्य श्री महेन्द्रऋषिजी म.सा. ने माना कि जैन एकता के लिए अब पहले से अधिक बेहतर परिस्थितियां निर्मित हुई है। जैन धर्म के विभिन्न सम्प्रदायों ओर परम्पराओं के मध्य आपसी सौहार्द, सामंजस्य ओर सद्भाव बढ़ा है। सभी के सहयोग से ही जैन एकता मजबूत हो सकती है। तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमणजी म.सा. ने 9 वर्ष पूर्व श्रमण संघ के आचार्य द्वारा तय होने वाली संवत्सरी तिथि को स्वीकार करने की पहल कर इस दिशा में सराहनीय पहल की। उन्होंने कहा कि आपसी सौहार्द ओर सामंजस्य बढ़ाने के लिए संतों को ही नहीं श्रावकों को भी प्रयास करने होंगे ओर संकीर्ण हितों का त्याग कर एकता के भाव को महत्व देना होगा। उन्होंने बताया कि जैन धर्म की स्थानकवासी परम्परा में वर्तमान में 1185 के करीब संत साध्वी है जो आचार्य सम्राट ध्यान योगी पूज्य डॉ. शिवमुनिजी म.सा. के नेतृत्व में धर्म प्रभावना करते हुए संघ समाज को सेवाएं दे रहे है। युवाचार्य भगवंत ने बताया कि भगवान महावीर का संदेश जिनवाणी के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने के लक्ष्य से ही भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास करने आए है। इससे पूर्व भी दो बार भीलवाड़ा आना हुआ लेकिन चातुर्मास के लिए पहली बार आए है। पिछले वर्ष मुंबई के पनवेल में चातुर्मास सम्पन्न करने के बाद करीब 1400 किलोमीटर की विहार यात्रा करते हुए वह भीलवाड़ा आए है। उन्होंने भीलवाड़ावासियों की सेवा ओर भक्ति भावना की सराहना करते हुए कहा कि इसी कारण यहां से चातुर्मास का प्रस्ताव आने पर उसे स्वीकार कर लिया। युवाचार्यश्री ने युवाओं की धर्म से विमुखता बढ़ने सम्बन्धी सवाल पर कहा कि युवाओं को धर्म से जोड़ने ओर इसका महत्व समझाने का कार्य सबसे पहले परिवार ओर परिजनों को करना पड़ेगा ओर संतो ंके सानिध्य में आएंगे तो उनके मन के भाव भी अवश्य बदलेंगे। वर्तमान की पावन स्टेयरिंग जनरेशन को धर्म से जोड़ने के लिए उपदेश की नहीं संवाद की जरूरत है ओर चातुर्मास में प्रयास करेंगे कि संवाद के माध्यम से युवाओं को धर्म ओर जिनवाणी से जोड़ा जा सके।

विहार सेवा देकर हो सकती संतों की सुरक्षा
युवायार्य महेन्द्रऋषिजी म.सा. ने विहार के दौरान संत-साध्वियों के दुर्घटनाग्रस्त होने सम्बन्धी सवाल पर कहा कि विहार करना संयम जीवन का अभिन्न हिस्सा है। विहार सेवा देकर संत साध्वियों की सुरक्षा में श्रावक श्राविका भी सहभागी हो सकते है। कई जगह विहार सेवा संघ के माध्यम से अच्छा कार्य इस क्षेत्र में हो रहा है। उन्होंने कहा कि विहार के दौरान सड़क पर हादसों का बड़ा कारण तेज गति से चलने वाले कंटेनर ओर दुपहिया वाहन होते है। विहार करने वाले संत साध्वियों को सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाने में सभी सहयोग जरूरी होता है। पत्रकार वार्ता में मेवाड़ गौरव रविन्द्र मुनिजी म.सा., तपस्वी धवल ऋषिजी म.सा. सहित साध्वी मण्डल का भी सानिध्य प्राप्त हुआ। सभी का स्वागत चातुर्मास आयोजन शांतिभवन श्रीसंघ के अध्यक्ष राजेन्द्र चीपड़, मंत्री नवरतनमल भलावत, उपाध्यक्ष सुशील चपलोत आदि पदाधिकारियों ने किया।

चातुर्मास में होगा चतुर्विद संघ का समागम
पत्रकार वार्ता में बताया गया कि चातुर्मास के दौरान युवाचार्य भगवंत महेन्द्र ऋषिजी म.सा. सहित 4 संतों एवं 17 साध्वियों का सानिध्य प्राप्त होने से प्रवचन में चतुर्विद संघ का समागम रहेगा। चातुर्मास करने वालों में युवायार्य महेन्द्र ऋषिजी म.सा., हितमित भाषी हितेन्द्रऋषिजी म.सा., तपस्वी धवल ऋषिजी म.सा., विद्याभिलाषी महकऋषिजी म.सा. आदि ठाणा शामिल होंगे। चातुर्मास में काशीपुरी में विराजित सेवाभावी ज्ञानकंवरजी म.सा. आदि ठाणा 4, मधुकंवरजी म.सा. आदि ठाणा 2, उप प्रवर्तिनी दिव्यज्योतिजी म.सा. आदि ठाणा 6, मधुर व्याख्यानी सुचेताजी म.सा. आदि ठाणा 3, स्मितभाषी पियूषदर्शनाजी म.सा. आदि ठाणा 2 का भी सानिध्य श्रावक श्राविकाओं को प्राप्त होगा।

आठ वर्ष की उम्र में वैराग्य ओर 14 वर्ष की उम्र में दीक्षा
प्रेसवार्ता में मीडियाकर्मियों को युवाचार्य भगवंत महेन्द्रऋषिजी म.सा. की सांसारिक पृष्ठभूमि ओर संयमजीवन के बारे में भी जानकारी दी गई। उन्होंने आठ वर्ष की उम्र में वैराग्य धारण किया ओर 14 वर्ष की उम्र में श्रमण संघीय आचार्य सम्राट पूज्य आनंदऋषिजी म.सा. के सानिध्य में दीक्षा अंगीकार की। संयम साधना करते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों में चातुर्मास ओर विहार यात्रा के माध्यम से पहुंच लाखों लोगों को जिनवाणी श्रवण करा जिनशासन से जोड़ने का कार्य किया। वर्ष 2015 में श्रमण संघीय आचार्य सम्राट डॉ. शिवमुनिजी म.सा. ने उन्हें युवाचार्य का दायित्व सौंपा ओर समाजजनों ने उन्हें आदर की चादर की समर्पित कर इस घोषणा की अनुमोदना की।

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