पेंशन कर्मचारी का अधिकार- सरकार का सामाजिक दायित्व

लेखक – प्रो. डी.के. शर्मा, रतलाम

भारत में सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन की शुरुआत ब्रिटिश शासनकाल के दौरान 1770 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा अपने यूरोपीय सैनिक और अधिकारियों के लिए की गई थी। आजादी के बाद भारत सरकार ने इस व्यवस्था को आगे बढाया, जिसके बाद पेंशन प्रणाली के मुख्य चरण इस प्रकार रहे- पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) आजादी के बाद केन्द्र और राज्य सरकारों ने सरकारी कर्मचारियों के लिए ओल्ड पेंशन स्कीम लागू की। इस प्रणाली के तहत कर्मचारी को सेवानिवृत्ति के बाद अंतिम मूल वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन के रुप में आजीवन मिलता था। राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) इस व्यवस्था को समाप्त करके केन्द्र सरकार ने 1 जनवरी 2004 से नेशनल पेंशन सिस्टम लागू किया। यह एक अंशदायी योजना है जिसमें कर्मचारी और सरकार दोनों एक निश्चित राशि जमा करते है और पेंशन बाजार के रिटर्न पर निर्भर करती है। इस योजना में कर्मचारी को बहुत ही कम पेंशन के रुप में मिलती है। यह एक तरह से पेंशन का मजाक है।
आठवें वेतन आयोग की सिफारिशें आने ही वाली है इसलिए कर्मचारियों के लिए पेंशन का प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। 1 जनवरी 2004 से पुरानी पेंशन व्यवस्था केंद्र सरकार ने बंद कर दी। राज्यों ने भी इसे तुरंत बंद कर दिया। पुरानी पेंशन व्यवस्था को समाप्त करना बहुत अन्याय पूर्ण निर्णय था। पूरे जीवन सरकारी सेवा में लगा देने के बाद पेंशन न मिलना बहुत अनुचित और अन्याय पूर्ण है। यदि कर्मचारी को पेंशन नहीं मिलेगी तो उसके लिए जीवनयापन करना बहुत कठिन हो जाता है। नई पेंशन व्यवस्था पेंशन का मजाक है। नई व्यवस्था में सरकारी कर्मचारी से अंशदान लिया जाता है। इस रकम को शेयर मार्केट में लगा दिया जाता है। शेयर मार्केट की अनिश्चितता से सभी परिचित हैं। इससे प्राप्त होने वाली धनराशि कर्मचारी का मजाक उड़ाना है। इस नई व्यवस्था से प्राप्त होने वाली धनराशि से एक व्यक्ति की दो समय की रोटी का जुगाड़ करना भी असंभव है।
पुरानी पेंशन व्यवस्था बंद करने वाली सरकार के सदस्य पेंशन और अन्य सुविधाएं सरकार से लेते रहे हैं। वर्तमान में भी यदि कोई व्यक्ति एक दिन भी किसी विधायिका का सदस्य रहता है तो पेंशन आदि सहित सभी आर्थिक लाभ उसे आजीवन प्राप्त होते रहते हैं। तत्कालीन सरकार में पदस्थ व्यक्तियों को सरकारी कर्मचारियों पर दया नहीं आई, जबकि स्वयं सभी सरकारी सुविधाओं पर गुलछर्रे उड़ाते रहे हैं। आश्चर्य है अपने आपको समाजवादी और साम्यवादी कहने वाले संसद सदस्यों ने भी पेंशन समाप्त करने के अमानवीय कदम का विरोध शायद नहीं किया। तत्कालीन सरकार ने पेंशन को सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ बताया था। यदि सरकारी कर्मचारी को मिलने वाली पेंशन सरकारी खजाने पर अनावश्यक बोझ थी तो सभी विधायिका सदस्यों को मिलने वाले लाभ को भी समाप्त किया जाना चाहिए था। तत्कालीन सरकार का यह निर्णय सामाजिक न्याय के किसी भी तराजू पर सही नहीं कहा जा सकता। एक ओर 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जाता है, दूसरी ओर पूरा जीवन शासन की सेवा में खपा देने वाले व्यक्ति की पेंशन बंद कर दी जाती है। यह न्याय का कौन सा सिद्धांत है ?
समानता का सिद्धांत प्रत्येक प्रजातांत्रिक देश के संविधान का मूलभूत अंश होता है। भारतीय संविधान का भी है, इसलिए सरकारी कर्मचारियों की पेंशन समाप्त करने जैसा निर्णय किसी एक वर्ग पर लागू नहीं होना चाहिए। यदि पेंशन बंद करनी थी तो सभी वर्गों की जानी चाहिए थी। पूरा जीवन शासकीय सेवा में खपा देने वाले केवल कर्मचारी की पेंशन बंद करना सरकार का बहुत ही अनुचित, अमानवीय निर्णय रहा है। कर्मचारी संगठन प्रारंभ से ही इस निर्णय का विरोध करते रहे है किन्तु किसी भी सरकार ने संवेदनशीलता दिखाकर पुरानी पेंशन व्यवस्था पुनः लागू नहीं की।
दुर्भाग्य से विरोधी दल भी इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं। उनको अपने लाभ के लिए ही सही इस विषय पर कर्मचारियों का समर्थन करना चाहिए। प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी चुप्पी साधे बैठा है।वामपंथ करीब-करीब समाप्त हो चुका है। कर्मचारी संगठन भी पुरानी पेंशन व्यवस्था पुनः लागू करने के लिए प्रभावी संघर्ष नहीं कर पाए हैं। आठवें वेतन आयोग की सिफारिशें आने ही वाली है।यह उचित समय है पुरानी पेंशन व्यवस्था पुनः लागू करवाने के लिए प्रभावशाली संघर्ष करने का।
सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास के सिद्धांत की बात करने वाली सरकार का यह सामाजिक दायित्व है कि पुरानी पेंशन व्यवस्था को पुनः प्रभावी किया जाए। यह कर्मचारी पर एहसान नहीं होगा। पूरा जीवन शासकीय सेवा में व्यतीत करने वाले कर्मचारी को पेंशन से वंचित करना बहुत ही अमानवीय है। सेवानिवृत्ति के बाद बिना पेंशन राशि के समय व्यतीत करना लगभग असंभव हो रहा है। सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन देना सरकार का मानवीय कर्त्तव्य भी है। सरकारी सेवा में रहते हुए सम्मानजनक जीवन व्यतीत करने वाला सरकारी कर्मचारी पेंशन से प्राप्त होने वाली आर्थिक सहायता के बिना सम्मानजनक जीवन व्यतीत नहीं कर सकता।
बदलते सामाजिक परिदृश्य की दृष्टि से भी विचार करें तो पेंशन की अनिवार्यता समझने में आ जाएगी। सरकारी नौकरी करने वाले अधिकतर कर्मचारी मध्यम वर्ग के होते हैं। उनके बच्चे अन्यत्र अन्य स्थानों पर काम करने चले जाते है और आवश्यक आर्थिक सहायता अपने माता-पिता को नहीं दे पाते हैं। बदलते सामाजिक परिदृश्य पर नजर रखने वाले जानते है कि अधिकतर संतानें अपने माता-पिता की चिंता नहीं करतीं। इसके भी दो कारण है- वे स्वयं इतना नहीं कमाते कि माता-पिता को स्वतंत्र रुप से रहने के लिए आवश्यक आर्थिक सहायता दे सके। इसके अतिरिक्त नई पीढ़ी की मानसिकता भी बहुत बदल गई है। अधिक संख्या में ऐसी संतानें है जो अपने माता-पिता की चिंता नहीं करते। सहायता करने में सक्षम होने के बाद भी सहयोग नहीं करते। यह आधुनिक संस्कृति का बदलता हुआ परिदृश्य है। अब हमारे देश में भी यह सामाजिक परिवर्तन प्रभावी होता जा रहा है। इस परिवर्तन को रोकना असंभव है इसलिए भी सरकारी कर्मचारी को सेवानिवृत्ति पर उचित पेंशन मिलना ही चाहिए ताकि वह सम्मानजनक वृद्धावस्था व्यतीत कर सकें।
उपरोक्त विश्लेषण उचित पेंशन की आवश्यकता को प्रमाणित करता है। आठवें वेतन आयोग को कर्मचारी की समस्या पर बहुत संवेदना के साथ विचार करना चाहिए। सामाजिक न्याय की बात करने वाली वर्तमान सरकार को भी संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाकर पुरानी पेंशन व्यवस्था पुनः लागू करने के लिए सहमति प्रदान करना चाहिए। पेंशन पूरे जीवन के समर्पण का प्रतिफल होता है, किसी की कृपा का प्रतिफल नहीं। अतः आठवें वेतन आयोग को पुरानी पेंशन व्यवस्था पुनः प्रभावी करने की अनुशंसा करनी चाहिए।

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