रतलाम, 27 जुलाई। सत्य से जिसे प्यार होता है, वह संत होता है। आत्मा ही सत्य है और बाकी सब झूठ है। कर्म के अधीन बनी ये आत्मा संसार में विचरण करती रहती है। इस आत्मा की तरफ जाने का प्रयास करे और उसके निकट जाए, वहीं संत है। संत बनना सरल, लेकिन निग्रन्थ बनना कठिन है।
ये उदगार मोहन टाकीज स्थित श्री सौभाग्य प्रकाश दरबार में रत्नपुरी के रत्न श्रमण संघीय प्रवर्तक पूज्य श्री प्रकाश मुनिजी मसा निर्भय ने व्यक्त किए। मालव केसरी पूज्य गुरुदेव सौभाग्यमल जी मसा के सुशिष्य प्रवर्तकश्री ने सोमवार सुबह प्रवचन देते हुए कहा कि निग्रन्थ हर राग-द्वेष की ग्रन्थि खोल देता है। वह सारी आत्माएं मेरी जैसी है, का भाव रखता है और कभी ये तेरा, ये मेरा है, में उलझता नहीं है। गुरूदेव मालव केसरी श्री सौभाग्यमलजी मसा के जीवन में कोई ग्रन्थी नहीं थी। वे प्रदेश और देश में सभी साधु-संतों से समभाव से मिलते थे। उन्होंने सबके मन की राग-द्वेष की गांठ खुलवाई और ये श्रमण संघ बनाया है। ये श्रमण संघ बडी मेहनत से बना है। इसे मजबूत करना ही गुरूदेव के प्रति सच्ची श्रृद्धांजलि है।
प्रवर्तकश्री ने कहा कि जीवन में संतत्व सरलता से दिख सकता है, लेकिन निग्रन्थ निकट आने पर पता चलता है। मनुष्य जब अकेले बैठता है, तो तन-मन की सारी थकान मिट जाती है, आत्मा के निकट रहता है, तो शांति का अनुभव करता है। मन से शरीर के पास रहता है, तो सुख-दुख अनुभव करता है और अपने के पास रहता है, तो आनंद का अनुभव करता है। दरअसल संयम बाहर की चीज है और चारित्र अंदर की चीज है। इसे निग्रन्थ ही हासिल करते है।
प्रवचन के आरंभ में जाप किए गए। प्रवर्तकश्री से कई तपस्वियों को अलग-अलग तप आराधना के प्रत्याख्यान लिए। इस दौरान सेवाभावी श्री दर्शनमुनिजी मसा, उपप्रर्वतनी, महासती, प्रवचन प्रभाविका श्री सुमनप्रभाजी मसा ठाणा-8 एवं महासती श्री चंदनबालाजी मसा एवं सेवाभावी श्री कल्पनाजी मसा मंचासीन रहे। प्रवचन में श्री धर्मदास जैन श्री संघ सदस्यगण, श्री धर्मदास जैन मित्र मंडल ट्रस्ट, श्री सौभाग्य तीर्थ ट्रस्ट, श्री सौभाग्य जैन नवयुवक मंडल, श्री सौभाग्य प्रकाश युवक मंडल, श्री सौभाग्य जैन महिला मंडल, श्री सौभाग्य अणु बहु मंडल एवं श्री सौभाग्य प्रकाश बालक-बालिका मंडल के सदस्यगण सहित प्रदेश-देश के विभिन्न स्थानों से आए गुरूभक्त उपस्थित थे। संचालन श्री संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रकाश मूणत ने किया।