
मोहनखेड़ा। धार्मिक आयोजनों में जहां अक्सर बैंड-बाजे और भव्य शोभायात्राएं देखने को मिलती हैं, वहीं मोहनखेड़ा तीर्थ पर सोमवार को एक अलग ही दृश्य देखने को मिला। त्रिस्तुतिक जैन परंपरा के आचार्यदेव श्री हेमेंद्र सुरीश्वर जी म.सा. के अंतेवासी शिष्यरत्न एवं आचार्यदेव श्री ऋषभचंद्र सुरीश्वर जी म.सा. के समुदायवर्ती शासन प्रभावक, सिद्धितप प्रेरक एवं प्रखर प्रवचनकार मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी म.सा., मुनिराज श्री जिनभद्र विजय जी म.सा. आदि ठाणा का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश पूर्णतः सादगी, मर्यादा और संत परंपरा के अनुरूप संपन्न हुआ।
मंगल प्रवेश यात्रा में न ढोल बजे, न नगाड़े और न ही किसी प्रकार का आडंबर दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने केवल जयघोषों के साथ पूज्य मुनिराज श्री का स्वागत किया। यात्रा के दौरान “मालवा-रतलाम के नंदन, कोटि-कोटि वंदन” तथा “जब तक सूरज-चाँद रहेगा, गुरु राजेंद्र-हेमेंद्र का नाम रहेगा” जैसे जयघोषों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।
मंगल प्रवेश में मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ क्षेत्र सहित महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु तथा राजस्थान के विभिन्न श्रीसंघों से करीब 1700 श्रावक-श्राविकाएं मोहनखेड़ा पहुंचे और गुरुदेव के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
मुनिराज श्री की अगवानी वरिष्ठ मुनिराज पियूषचंद्र विजय जी म.सा., दिव्यचंद्र विजय जी म.सा. एवं पुष्पेंद्र विजय जी म.सा. ने की। धर्मसभा में मुनिराज श्री पियूषचंद्र विजय जी म.सा. ने मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी को अपना गुरु भ्राता बताते हुए उनके मर्यादित एवं आडंबररहित मंगल प्रवेश की सराहना की।
उल्लेखनीय है कि 23 जुलाई को परम पूज्य आचार्य भगवंत हितेशचंद्र सुरिश्वर जी म.सा. आदि ठाणा का चातुर्मासिक मंगल प्रवेश भी इसी मर्यादा के साथ हुआ था। उसी परंपरा का अनुसरण करते हुए मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी म.सा. ने भी अपने प्रवेश को पूरी तरह सादगीपूर्ण रखा। संत परंपरा के इस अनुकरणीय स्वरूप ने श्रद्धालुओं के बीच संयम, समभाव और विनम्रता का संदेश दिया।
अपने प्रथम चातुर्मासिक प्रवचन में मुनिराज श्री चंद्रयश विजय जी म.सा. ने श्रद्धालुओं से चातुर्मास के दौरान नवकारसी पच्चखान के बिना जल का उपयोग नहीं करने, कंदमूल एवं लिलोत्री सब्जियों का त्याग, रात्रि भोजन का त्याग तथा छोटे-से-छोटे धार्मिक नियमों का जयणा पूर्वक पालन करने का आह्वान किया।
मंगल प्रवेश में रतलाम, जावरा, नागदा, खाचरौद, आलोट, महिदपुर, थांदला, बड़नगर, इंदौर, उज्जैन, टांडा, बाग, कुक्षी, मुंबई, हैदराबाद, विजयवाड़ा, चेन्नई, गुंटूर, राजामुंद्री तथा राजस्थान के भीनमाल, आहोर, गुड़ा, बालोतरा, सायला और नाकोड़ा सहित अनेक श्रीसंघों के श्रद्धालुओं की उपस्थिति रही।