
मृत्यु के बाद भी जिएगी इंसानियत: रतलाम के जीवाखान परिवार ने एक साथ लिया देहदान एवं अंगदान का महासंकल्प
रतलाम। “जब जीवन का अंत हो, तब भी मानवता का सफर समाप्त नहीं होना चाहिए। यदि हमारा शरीर किसी के जीवन, चिकित्सा शिक्षा और समाज के कल्याण का माध्यम बन सके, तो यही जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता है।”
रतलाम शहर ने एक बार फिर मानवता, सेवा और सामाजिक चेतना का ऐसा प्रेरणादायी उदाहरण देखा, जिसने हर संवेदनशील मन को भावुक कर दिया। रेडक्रॉस सोसायटी रतलाम, हेल्पिंग हैंड्स ग्रुप (हेल्पिंग हैंड्स रतलाम वेलफेयर सोसाइटी) एवं नेत्रम संस्था के संयुक्त प्रयास से शहर के प्रतिष्ठित जीवाखान परिवार के चार सदस्यों ने मरणोपरांत देहदान एवं अंगदान का महासंकल्प लेकर समाज के सामने एक अनुकरणीय मिसाल प्रस्तुत की।
जीवाखान परिवार ने डॉ. लक्ष्मीनारायण पांडे शासकीय चिकित्सा महाविद्यालय, रतलाम की अधिष्ठाता डॉ. (प्रो.) अनिता मुथा को मरणोपरांत देहदान का संकल्प पत्र सौंपा। साथ ही परिवार के सदस्यों ने राष्ट्रीय अंग एवं ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) की रजिस्ट्री में स्वयं को अंगदाता के रूप में पंजीकृत कर मृत्यु के बाद भी अनेक जरूरतमंदों को नया जीवन देने का संकल्प लिया।
रक्तदान से देहदान तक सेवा का अद्भुत सफर
समाजसेवा के क्षेत्र में सदैव अग्रणी रहने वाले डॉ. मिराज जीवाखान, जो वर्षों से नियमित रक्तदान कर अनेक लोगों को नया जीवन प्रदान कर चुके हैं, अब अपने पूरे परिवार के साथ मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा के इस महायज्ञ में सहभागी बने हैं। उनका यह निर्णय समाज के लिए एक प्रेरणा है कि सेवा का वास्तविक अर्थ जीवन की अंतिम सांस के बाद भी जीवित रहना है।
महासंकल्प लेने वाले परिवार के सदस्य – श्रीमती शबाना जीवाखान, श्री मुन्नवर जीवाखान, डॉ. फेथ जीवाखान, डॉ. मिराज जीवाखान
परिवार ने बताया कि यह निर्णय उन्हें स्वर्गीय जनाब जैनुद्दीन वली, स्वर्गीय श्रीमती ज़ुबेदा वली के सेवा संस्कारों एवं डॉ. सुजात वली के प्रेरणादायी मार्गदर्शन से लेने की प्रेरणा मिली। उनका मानना है कि जब शरीर अंततः पंचतत्व में विलीन होना ही है, तो क्यों न वही शरीर चिकित्सा शिक्षा का आधार बने और भावी चिकित्सकों का ‘साइलेंट टीचर’ बनकर हजारों मरीजों के उपचार का माध्यम बने।
देहदान चिकित्सा विद्यार्थियों को मानव शरीर की गहन जानकारी प्रदान करता है, जबकि अंगदान किसी जरूरतमंद को नया जीवन दे सकता है। इस प्रकार यह निर्णय केवल एक परिवार का संकल्प नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक जीवंत संदेश है कि मृत्यु अंत नहीं, बल्कि किसी और के जीवन की नई शुरुआत भी बन सकती है।
इस अवसर पर रेडक्रॉस सोसायटी के चेयरमैन प्रितेश गादिया, वाइस चेयरमैन सुशील मूणत, संचालक हेमन्त मूणत, दिनेश बरमेचा, नेत्रम संस्था के नवनीत मेहता एवं शलभ अग्रवाल सहित अनेक समाजसेवी उपस्थित रहे। सभी ने जीवाखान परिवार के इस अनुकरणीय निर्णय का अभिनंदन करते हुए कहा कि ऐसे प्रेरक संकल्प समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का कार्य करते हैं और अधिक से अधिक लोगों को देहदान एवं अंगदान के लिए प्रेरित करेंगे।
कार्यक्रम में उपस्थित सभी संस्थाओं ने आमजन से आह्वान किया कि वे भी देहदान एवं अंगदान का संकल्प लेकर मृत्यु के बाद भी मानवता की सेवा का हिस्सा बनें। क्योंकि किसी व्यक्ति का अंतिम निर्णय अनेक लोगों के जीवन में नई उम्मीद, नई रोशनी और नया भविष्य लेकर आ सकता है।
“देह समाप्त होती है, लेकिन उससे किया गया दान कभी समाप्त नहीं होता। वह ज्ञान बनकर डॉक्टरों में, जीवन बनकर मरीजों में और प्रेरणा बनकर समाज में सदैव जीवित रहता है।”