श्रद्धा और विश्वास से ही उजागर होता है अंतर्मन का सत्य : विशोकानंद भारती

कठोपनिषद में नचिकेता-यमराज संवाद की व्याख्या; श्रीमद्भागवत कथा में संत सेवा को बताया कल्याण और मोक्ष का मार्ग

रतलाम। स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत रविवार को प्रातःकाल कठोपनिषद का स्वाध्याय एवं सायंकाल श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन हुआ। निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
कठोपनिषद के प्रसंग की व्याख्या करते हुए आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी विशोकानंद जी भारती ने कहा कि नचिकेता अपने पिता की आज्ञा से यमराज के पास पहुंचता है। यमराज के संबंध में समाज में अनेक भ्रांतियां हैं। सामान्यतः उन्हें केवल मृत्यु का देवता माना जाता है, जबकि सनातन परंपरा में यमराज कर्मों के फल और धर्म के विधान से भी जुड़े हुए हैं। नचिकेता तीन दिन तक यमराज के द्वार पर भूखा-प्यासा प्रतीक्षा करता रहा। लौटने पर यमराज ने प्रसन्न होकर उसे तीन वरदान मांगने का अधिकार दिया।
स्वामी जी ने बताया कि नचिकेता ने पहला वरदान अपने पिता की प्रसन्नता और उनके क्रोध के शांत होने के लिए मांगा। दूसरे वरदान में उसने यज्ञ विद्या का ज्ञान मांगा। यमराज ने उसे यज्ञ का ज्ञान प्रदान किया और वह यज्ञ आगे चलकर ‘नचिकेता अग्नि’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। तीसरे वरदान में नचिकेता ने मृत्यु के रहस्य और उसके पार के सत्य को जानने की जिज्ञासा प्रकट की।
उन्होंने कहा कि वैराग्य का अर्थ केवल संसार का त्याग करना नहीं, बल्कि सभी प्रकार के चिंतन के बीच मन को सही दिशा में स्थापित करना है। मन और इंद्रियों पर नियंत्रण साधना का महत्वपूर्ण आधार है। उन्होंने साम, दम और श्रद्धा की महत्ता बताते हुए कहा कि शास्त्रों और गुरु के वचनों में दृढ़ विश्वास ही श्रद्धा है।
स्वामी जी ने कहा कि श्रद्धा ऐसी होनी चाहिए जैसी माता पार्वती की अपने इष्ट के प्रति थी। उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर अपने गुरु, इष्ट और शास्त्रों के प्रति दृढ़ श्रद्धा एवं विश्वास नहीं होता, तब तक उसके भीतर का सत्य उजागर नहीं हो सकता। उन्होंने भगवान श्रीराम एवं भगवान शिव से जुड़े प्रसंगों का उल्लेख करते हुए श्रद्धा की दृढ़ता को साधना का आधार बताया।
उन्होंने कहा कि साधक का स्वभाव बदलना चाहिए। केवल बाहरी वेशभूषा बदल लेने से कोई साधु नहीं बन जाता। वाणी में संयम होना चाहिए और अनावश्यक बोलने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि साधना का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के आचरण और स्वभाव में परिवर्तन लाना है।
स्वामी जी ने कहा कि तांत्रिक परंपरा में प्रत्येक स्त्री को देवी स्वरूप माना गया है। इसलिए साधक के लिए नारी के प्रति सम्मान और पवित्र दृष्टि रखना आवश्यक है। उन्होंने काम, क्रोध और विषय-विकारों से ऊपर उठकर संयमित जीवन जीने का संदेश दिया।
उन्होंने स्वर्ग के विषय में भी कहा कि स्वर्ग स्थायी नहीं है। पुण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाला स्वर्ग भी कर्मफल की अवधि पूरी होने पर समाप्त हो जाता है। इसलिए साधक को केवल स्वर्ग की कामना नहीं, बल्कि परम सत्य और मोक्ष की प्राप्ति का लक्ष्य रखना चाहिए।
भागवत कथा में संत सेवा को बताया मोक्ष का मार्ग
सायंकाल आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में गोकर्ण की कथा का प्रसंग सुनाते हुए स्वामी जी ने कहा कि संतों की सेवा और सत्संग मनुष्य के जीवन का कल्याण कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि यदि किसी भक्त ने संत की सेवा की है तो उसका जीवन निश्चित रूप से कल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। कथा का श्रवण तभी सार्थक है, जब उससे मनुष्य के जीवन की व्यथा दूर हो और उसके आचरण में सकारात्मक परिवर्तन आए।
उन्होंने कहा कि “कथा सुनी है तो व्यथा दूर होनी चाहिए।” केवल कथा सुनना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके संदेश को जीवन में उतारना आवश्यक है। संत सेवा, सदाचार और संयम को जीवन में अपनाकर ही मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ सकता है।
स्वामी जी ने गोकर्ण प्रसंग के माध्यम से कर्म और आचरण की महत्ता समझाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बावजूद चोरी और परस्त्रीगमन जैसे अधर्म के कार्य करता है, तो केवल जन्म उसे श्रेष्ठ नहीं बना सकता। ऐसे दुष्कर्मों के कारण उसे अधोगति का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रेष्ठता जन्म से नहीं, बल्कि कर्म, आचरण और संस्कारों से निर्धारित होती है।
स्वामी जी का किया स्वागत-सम्मान
प्रवचन पक्ष में रुद्र महाकाल समिति की ओर से महामंडलेश्वर जी का स्वागत एवं सम्मान किया गया। इस अवसर पर बालाजी धाम अलकापुरी एवं परशुराम कल्याण बोर्ड के पदाधिकारियों तथा श्रद्धालुओं ने संतों का अभिनंदन किया।
स्वागत एवं सम्मान के अवसर पर संभाग प्रभारी अनुराग लोखंडे, अजय तिवारी, चेतन शर्मा, अमर सारस्वत, पुष्पेंद्र जोशी, राजेश शर्मा, राजेश तिवारी, सत्येंद्र जोशी, सुनील कुमार दुबे, नीरज सक्सेना, कचरुमल सांखला, नवीन शर्मा, अरविंद बारिया, मोहित राठौड़, राहुल पोरवाल, शालिग्राम पांडे, राजेश पांडेय, उमेश मिश्रा, शरद चतुर्वेदी, जगदीश उपाध्याय, बृजेश मिश्रा, पी.पी. मिश्रा, लगन शर्मा, कश्यप जी सहित अन्य श्रद्धालुओं ने आरती की।
आरती के पश्चात प्रसादी का वितरण किया गया। कार्यक्रम में आश्रम के संतगण सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु महिला-पुरुष उपस्थित रहे।

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