


गुरु वाणी 10/08/2026 प्रवचन
नई दिल्ली, (राजेश जैन दद्दू) । ऋषभोदय में विराजित दिगम्बर जैन महाश्रमण पट्टाचार्य श्री विशुद्ध सागर जी गुरुदेव ने धर्म-सभा में सम्बोधन करते हुए कहा कि -जैन-धर्म अनादि सनातन है। दिगम्बर भ्रमण मुनियों ने अनादि से इसे सम्पुष्ट किया है। यह था, है और हमेशा रहेगा।
देखो, समझो, फिर निर्णय करो
जीवन में सुखी रहना चाहते हो, तो अधूरी बात सुनकर निर्णय नहीं करना। अचानक कोई दृश्य देखकर निर्णय नहीं करना। कभी-कभी देखा हुआ भी सत्य नहीं होता है। सुना हुआ भी सत्य नहीं होता है। विचार करके ही निर्णय करना चाहिए।
दुनिया में जितने भी अनर्थ हुए हैं, अनर्थ हो रहे हैं अधवा भविष्य में अनर्थ होंगे, वे मात्र भ्रम के कारण होते हैं। भ्रम से बचो, शंका शस्त्र के समान खतरनाक होती है। अच्छे से बात सुनो, देखो, चिंतन-मंथन करो, फिर निर्णय करो।
गिरो मत गिराओ मत
जीवन में आपको कोई पीड़ा कष्ट दे, तो आप उससे बदला मत लेना, उसे कर्म स्वयं ही देख लेगा। कर्म निश्पक्ष होता है। कर्म पक्षपात नहीं करता है। जो जैसा कर्म करेगा, उसका फल भी उसे भोगना पड़ेगा।
कषाय के वेग में, विपरीत परिस्थितियों में अपने आपको सँभालो। न गिरो और न ही किसी को नीचे गिराओ। किसी को गिराकर मत उठो, अपनी योग्यता से ऊपर उठो
शुद्धखाओ, शुद्ध भाषण करो
स्वस्थ जीवन जीना चाहते हो, सुखी रहना हो, रोगी न होना हो, तो शुद्ध एवं शाकाहार करो। आपके आहार (भोजन) पर ही आपका भाव होता है। भोजन से ही भाषण होता है। जैसा व्यक्ति भोजन करता है, वैसे ही उसके भाव और भाषण होता है।
जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन। जैसा पिओगे पानी, वैसी होगी वाणी। भोजन अनुसार ही विचार होते हैं। विचार और आचरण को पवित्र रखना चाहते हो, तो भोजन शुद्ध, सातविक व अल्प करो। उचित समय पर ग्रहण किया गया भोजन अमृत के समान हितकारी होता है, वहीं असमय में किया गया भोजन विष के समान कष्टकारी होता है। रोगों को बढ़ाने वाला एवं प्रमादकारी होता है। भोजन स्वाद, स्वच्छता, स्वस्थ्तता, पवित्रता, उत्साह- उमंग युक्त होना चाहिए। मानव के लिए “शाकाहार “ही सर्वोत्तम आहार है। शाकाहार ही मानवता की पहचान है।
संग्राम नहीं, समझौता करो
जीवन में शान्ति चाहिए तो संघर्ष करो, श्रम करो, पर संग्राम (युद्ध) मत करो। संग्राम श्रेष्ठ नहीं, समझौता करो। जीवन में अशान्ति के लिए एक शत्रु भी बहुत होता है। शत्रुता से बचो। शत्रुता से शत्रुता बढ़ती है, मित्रता से मित्रता बढ़ती है। समता भाव धारण करो। मैत्री भावना भाओ। क्षमा से ही सम्पूर्ण विश्व मैत्री के सूत्र में बंध सकता है। जियो और जीने दो। जीना हमारा अधिकार है, तो दूसरों को जीने देना भी हमारा कर्तव्य है। अधिकार मौगने के साथ-साथ, अपने कर्तव्यों का भी पालन करो।