27 देशों में शाखाएं स्थापित करने का लक्ष्य, पांच आध्यात्मिक शक्तिपीठ भी बनेंगे

जावरा। अंतरराष्ट्रीय जैन दिवाकर विचार मंच के वरिष्ठ मार्गदर्शक अभय सुराणा ने बताया कि हल्लादकेरी स्थित जैन स्थानक भवन में आयोजित अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच की दो दिवसीय विचार गोष्ठी का समापन एक ऐतिहासिक निर्णय के साथ हुआ। विचार गोष्ठी में मंच के स्वरूप एवं कार्यक्षेत्र को व्यापक बनाते हुए “अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच” का विस्तार कर अब “अंतर्राष्ट्रीय जैन दिवाकर विचार मंच” के रूप में कार्य करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया।
इस महत्वपूर्ण निर्णय के साथ मंच का कार्यक्षेत्र अब भारत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विश्व के विभिन्न देशों में शाखाओं के माध्यम से मानवता, अहिंसा, आध्यात्मिक चेतना, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और सकारात्मक विचारों का संदेश पहुंचाया जाएगा। मंच ने आगामी चरण में 27 देशों में अपनी शाखाएं स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।
अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप की घोषणा के अवसर पर राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने कहा कि आज आवश्यकता धर्म को केवल पूजा-पाठ और उपासना तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि उसे मानव सेवा और प्राणी मात्र की सेवा से जोड़ने की है। विश्व के सभी धर्मस्थलों का उपयोग उपासना के साथ-साथ शिक्षा, चिकित्सा और सेवा के केंद्र के रूप में होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि मानवता दम तोड़ रही हो और हम अपनी साधना में ही मशगूल रहें तथा उसकी पीड़ा की ओर आंख उठाकर भी न देखें, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है। प्राणी मात्र की सेवा परमात्मा की भक्ति से भी बढ़कर है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक ज्ञान को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ जनता के सामने प्रस्तुत किया जाना चाहिए, ताकि वह प्रमाणिक बने और आस्था का मजबूत केंद्र बन सके। धर्मस्थलों को पर्यावरण, अहिंसा, योग, इंसानियत, सांप्रदायिक सौहार्द, देशभक्ति और ध्यान प्रशिक्षण के केंद्र के रूप में विकसित कर समाज को सन्मार्ग प्रदान किया जाए।राष्ट्रसंत ने कहा कि संत और संसारी समाज के बीच सेतु का कार्य करने वाले प्रचारकों की एक सशक्त टीम तैयार की जाए, जो विश्व के कोने-कोने में जाकर व्यक्ति-व्यक्ति तक आध्यात्मिक क्रांति का शंखनाद करे। महान संत सिद्धलिंग स्वामी ने कहा कि सभी धर्म सामाजिक बुराइयों का विरोध करते हैं। इसलिए संपूर्ण संत समाज को एक मंच पर आकर बुराइयों के खिलाफ संयुक्त मोर्चा खोलना चाहिए। तभी उन पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
नित्यानंद तिवारी ने कहा कि सोशल मीडिया का अधिकाधिक सकारात्मक उपयोग कर समाज में वैचारिक क्रांति लाना हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। उन्होंने सरकार की दोहरी नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि गुटखा, नशे और प्लास्टिक थैलियों के उपयोग को गलत मानकर प्रतिबंध लगाया जा रहा है, तो इनके उत्पादन पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जाता। उन्होंने कहा कि “न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी” की नीति अपनाकर उत्पादन पर ही रोक लगाई जानी चाहिए। पंचगांव विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. निरंजन वर्मा ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय जैन दिवाकर विचार मंच एवं शक्तिपीठ द्वारा देश में पांच आध्यात्मिक शक्तिपीठ स्थापित किए जाएंगे। विभिन्न कार्यों के संचालन के लिए 21 समितियों का गठन किया गया है। इंग्लैंड, बेल्जियम, नीदरलैंड, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, ईरान, इराक, अफगानिस्तान, पाकिस्तान सहित 27 देशों में मंच की शाखाएं स्थापित कर गरीब की झोपड़ी से लेकर महलों तक सकारात्मक एवं पवित्र विचारों का संचार किया जाएगा।उन्होंने बताया कि कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण एवं संगठन की गतिविधियों को गति देने के लिए वर्ष में एक बार विशाल अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा।
भारत सरकार के पूर्व सचिव कमल टावरी ने संगठन को मजबूत बनाने और उसके विस्तार पर जोर दिया। डॉ. सुभाष नालंगे ने कहा कि संगठन की प्रगति के लिए परस्पर विचारों का आदान-प्रदान अत्यंत आवश्यक है। कार्यक्रम का संचालन संघ के मंत्री बुद्धमल बाघमार ने किया।
अखिल भारतीय जैन दिवाकर विचार मंच के राष्ट्रीय वरिष्ठ मार्गदर्शक अभय सुराणा ने बताया कि मंच का अखिल भारतीय से अंतर्राष्ट्रीय स्वरूप में विस्तार होना संगठन के लिए गौरवपूर्ण एवं ऐतिहासिक उपलब्धि है। अब मंच का उद्देश्य भारत के साथ-साथ विश्व के विभिन्न देशों में मानवता, अहिंसा, सेवा, आध्यात्मिक चेतना, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित के विचारों को जन-जन तक पहुंचाना होगा। यह विस्तार जैन दिवाकर विचारधारा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान और नई ऊर्जा प्रदान करेगा। कार्यक्रम का संघ के मंत्री बुद्धिमल बाघमार ने किया।