लक्ष्य प्राप्ति के लिए साधक स्वयं को बाण बनाकर साधना में जुटे : स्वामी विशोकानंद जी भारती

कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के माध्यम से आत्मकल्याण का मार्ग बताया; साधना में प्रमाद छोड़कर सावधानीपूर्वक आगे बढ़ने का आह्वान

रतलाम 23 सितंबर। स्वामी ज्ञानानंद मार्ग, सैलाना बस स्टैंड स्थित श्री अखंड ज्ञान आश्रम में आयोजित दिव्य चातुर्मास महोत्सव के अंतर्गत बुधवार को श्रीमद् देवी भागवत महापुराण कथा ज्ञान यज्ञ का आयोजन निर्वाणी अखाड़ा पीठाधीश्वर, आचार्य महामंडलेश्वर परम पूज्य स्वामी श्री श्री 1008 विशोकानंद जी भारती के सानिध्य में हुआ। प्रातःकाल एवं सायंकाल आयोजित कथा-प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।
प्रवचन में स्वामी विशोकानंद जी भारती ने साधना में लक्ष्य, एकाग्रता और सावधानी के महत्व को समझाते हुए कहा कि साधक को अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह केंद्रित रहना चाहिए। उन्होंने अर्जुन के मछली की आंख पर निशाना साधने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि जिस प्रकार अर्जुन ने अपना ध्यान केवल लक्ष्य पर केंद्रित किया और द्रौपदी का स्वयंवर जीता, उसी प्रकार साधक को भी अपने जीवन के आध्यात्मिक लक्ष्य के प्रति एकाग्र रहना चाहिए। उन्होंने कहा कि “अपने को बाण बनाओ।” प्रमाद को छोड़कर सावधानीपूर्वक साधना करने वाला साधक अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। साधना के मार्ग में निरंतर अभ्यास, गुरुचरणों में श्रद्धा और समर्पण आवश्यक है।
स्वामी जी ने ब्रह्मविद्या के संदर्भ में कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग के मार्गों की चर्चा करते हुए कहा कि भगवती साधक को पहले कर्मयोग में सफल होने का संदेश देती हैं। कर्म करते हुए साधक को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और धीरे-धीरे साधना के माध्यम से उच्च आध्यात्मिक अवस्था की ओर बढ़ना चाहिए।
उन्होंने आश्रम एवं साधना परंपरा में जीवन के विभिन्न चरणों की चर्चा करते हुए कहा कि साधना के लिए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और अंततः कर्म-संन्यास की अवधारणा बताई गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्म-संन्यास का आशय कर्मों से पलायन नहीं, बल्कि कर्मों के प्रति आसक्ति का त्याग और आध्यात्मिक दृष्टि से जीवन को आगे बढ़ाना है।
भक्तियोग की व्याख्या करते हुए स्वामी जी ने कहा कि भक्ति के माध्यम से जीव परमात्मा का हो जाता है। भगवान और भक्त के बीच स्वाध्याय एवं सत्संग का विशेष महत्व है। उन्होंने भगवान श्रीराम और महर्षि वशिष्ठ के संवाद का उदाहरण देते हुए कहा कि राम और वशिष्ठ के बीच हुआ आध्यात्मिक स्वाध्याय ही आगे चलकर योग वशिष्ठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने ज्ञानयोग को साधना का महत्वपूर्ण पक्ष बताते हुए कहा कि साधक को धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए आत्मज्ञान की ओर बढ़ना चाहिए। उन्होंने साधकों को “शिवोऽहम्” भाव के निरंतर चिंतन और अभ्यास की प्रेरणा दी।
कथा के समापन पर आरती की गई। इसके पश्चात श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया गया। बुधवार की प्रसादी श्रीमती पदमा दिनेश राय की सुपुत्री श्रीमती दीप्ति पवन कुमार राय, एम.बी. नगर, रतलाम-उज्जैन के सहयोग से प्राप्त हुई।

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