


ऋषभविहार, दिल्ली (राजेश जैन दद्दू) । ऋषभविहार, दिल्ली में विराजमान परम पूज्य पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने आज श्रावक संस्कार शिविर में आयोजित विशेष धर्मसभा में जैन समाज को संबोधित करते हुए उत्तम आकिंचन्य धर्म का मर्म समझाया।
गुरुदेव ने कहा कि —
जो संयमी साधक षड्-रिपु अर्थात क्रोध, मान, माया, लोभ को छोड़कर क्षमा, मार्दव, आर्जव एवं शौच धर्म को धारण करता है और सत्य, संयम, तप, त्याग को जीवन में उतारता है, उसी सकल-संयमी साधक को ही “आकिंचन्य-धर्म” प्रकट होता है। उन्होंने कहा कि धर्म यथार्थ में सुख का साधन है। शांति का साधन है। धर्म ही मंगल है, धर्म ही उत्तम है, धर्म ही शरण है।
आकिंचन्य-धर्म का स्वरूप –
आकिंचन्य-धर्म की व्याख्या करते हुए गुरुदेव ने कहा —
“अन्य परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है, ऐसा भाव ही वास्तव में ‘आकिंचन्य-धर्म’ है। मैं हूँ, मेरे सम्बन्धी नहीं। पर को अपना मानना ही परिग्रह है। दूसरों के अधिकार को अपना समझना, दूसरों को अपना बनाने का विचार ही मिथ्या है। निज में निज का भाव ही आकिंचन्य भाव है।”
उन्होंने कहा — धन-धरती, भवन-वाहन, स्त्री-पुत्र, परिवार-सम्बन्धी, कुछ भी मेरा नहीं। यह शरीर भी मेरा नहीं। कुछ भी साथ नहीं जाएगा। यह शरीर भी यहीं छूट जाएगा। विचार करो — क्या साथ लाए थे? क्या साथ जाएगा?
जगत को आप राग-मोह से अपना कह सकते हो, पर अपना बना नहीं सकते हो।
आत्मबोध का सूत्र दिया गुरुदेव ने आत्मबोध का अनुपम सूत्र देते हुए कहा —
“मैं अकेला ही जन्मा हूँ, मैं अकेला ही मरूँगा, मेरा कुछ नहीं, मेरा पर नहीं, मैं पर का नहीं। मैं चेतन हूँ, जड़ अचेतन है। मैं शाश्वत हूँ, देह नश्वर है। मैं ज्ञान स्वभावी हूँ। जगत के सर्व द्रव्यों, पुद्गलों से मैं अत्यन्त भिन्न हूँ। आत्मा का स्वभाव परद्रव्यों से अत्यन्त भिन्न है।”
उन्होंने कहा कि जब तक जीव पर-पदार्थों को अपना मानता है, तब तक वह परिग्रह के बंधन में बंधा रहता है और दुखी होता है। जिस क्षण यह बोध हो जाता है कि परमाणु मात्र भी मेरा नहीं, उसी क्षण आत्मा में आकिंचन्य धर्म प्रकट हो जाता है और जीव हल्का होकर मोक्ष मार्ग की ओर बढ़ जाता है।
धर्मसभा में उपस्थित हजारों श्रावक-श्राविकाओं ने गुरुदेव की इस मंगल देशना को सुनकर आकिंचन्य धर्म को जीवन में उतारने का संकल्प लिया। पूरा पंडाल जयकारों से गूंज उठा।