श्रावक संस्कार शिविर एवं दशलक्षण महापर्व – उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म

इंदौर (राजेश जैन दद्दू) । श्रावक संस्कार शिविर एवं पर्युषण महापर्व के अंतिम दिन उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिपुंगव 108 श्री सुधासागर जी महाराज ने मिथुन चक्र, ब्रह्मचर्य, निमित्त और आत्मिक शक्ति की गहन आध्यात्मिक व्याख्या की।
मिथुन चक्र क्या है ?
मुनिश्री ने कहा कि संसार की अनेक क्रियाएँ और उपलब्धियाँ दो तत्त्वों के परस्पर संयोग से प्रकट होती हैं। इसी को मिथुन चक्र कहा जाता है। उन्होंने कहा — “भूख के बिना भोजन की कीमत नहीं, प्यास के बिना पानी की कीमत नहीं और गुरु के बिना शिष्य का अस्तित्व पूर्ण नहीं।” भगवान और भक्त, गुरु और शिष्य तथा अनेक संबंधों में परस्पर पूरकता दिखाई देती है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रोटी न आत्मा अकेली खाती है और न शरीर अकेला। आत्मा और शरीर के संयोग से भोजन करने की क्रिया होती है। इसी प्रकार चलना, सोना, देखना, सुनना और संसार की अनेक क्रियाएँ विभिन्न तत्त्वों के संयोग से संचालित होती हैं।
मुनिश्री ने कहा कि गुणस्थान, कषाय, योग और परिणामों को समझने में भी तत्त्वों के पारस्परिक संबंध को समझना आवश्यक है। ज्ञान के क्षेत्र में प्रमाण और नय दोनों का समन्वय महत्वपूर्ण है। केवल एक पक्ष से वस्तु की पूर्णता समझ में नहीं आती। उन्होंने कहा — “वस्तु स्वतंत्र है, लेकिन वस्तु का कार्य स्वतंत्र नहीं है; उसका कार्य अनेक तत्त्वों के परस्पर संबंध से प्रकट होता है।”
दुनिया से भागना ब्रह्मचर्य नहीं –
मुनिश्री ने ब्रह्मचर्य की व्याख्या करते हुए कहा कि ब्रह्मचर्य का अर्थ दुनिया से भागना नहीं है। संसार से भागकर व्यक्ति कमजोर और अकेला पड़ सकता है। धर्म का उद्देश्य संसार से पलायन करना नहीं, बल्कि संसार में रहते हुए अपनी शक्ति को बढ़ाना है। उन्होंने स्पष्ट कहा — “निमित्त से भागो मत, निमित्त को ठुकराओ मत। निमित्त से कार्य करना सीखो।”
जीवन में भगवान, गुरु, परिवार, समाज, मित्र, पड़ोसी या कोई विपरीत परिस्थिति — जो भी निमित्त सामने आए, सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति यह सोचता है कि इस निमित्त से मैं अपनी कौन-सी शक्ति जागृत कर सकता हूँ।
मुनिश्री ने कहा कि जहाँ-जहाँ दो वस्तुओं का संयोग होता है, वहाँ नई शक्ति और नई ऊर्जा का निर्माण होना चाहिए। यही दृष्टि साधक को हर परिस्थिति से कुछ सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
मन को रोकना नहीं, मन की शक्ति बढ़ाना है –
मुनिश्री ने कहा कि साधक का मन कभी संसार की ओर जा सकता है। केवल मन के किसी दिशा में जाने से व्यक्ति गिर नहीं जाता। महत्वपूर्ण यह है कि मन जहाँ गया, वहाँ से क्या लेकर वापस आया।
यदि किसी अनुभव से सोचने की शक्ति, चिंतन, साहस, समझ और विवेक बढ़ा है तो वह अनुभव साधना का माध्यम बन सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रास्ते में पड़े सोने के बिस्किट को उठाने वाला व्यक्ति बाहर से गिरा हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन वह वास्तव में कुछ अर्जित करके उठा है। इसी प्रकार सम्यक दृष्टि वाला व्यक्ति संसार में जाता हुआ दिखाई दे सकता है, लेकिन यदि वह वहाँ से ज्ञान और अनुभव लेकर लौटता है तो उसकी आध्यात्मिक कमाई हुई।
इंद्रियाँ बुरी नहीं, उनका उपयोग महत्वपूर्ण है –
मुनिश्री ने कहा कि इंद्रियाँ अपने आप में बुरी नहीं हैं। आँखों से भगवान के दर्शन होते हैं, शास्त्र पढ़े जाते हैं और ज्ञान प्राप्त होता है। कानों से धर्म सुना जाता है और मन से चिंतन किया जाता है।
उन्होंने कहा — “आँखों का भी ब्रह्मचर्य है।” आँख बाहर देखे तो केवल विषयों का भोग करके वापस न आए, बल्कि आत्मा के ज्ञान का भंडार बढ़ाकर आए। इसी प्रकार कान कुछ सुनें तो ज्ञान बढ़े, मन किसी विषय पर जाए तो चिंतन बढ़े और शरीर किसी कार्य में लगे तो शक्ति एवं सामर्थ्य का विकास हो।
ब्रह्मचर्य यानी शक्ति खोना नहीं, शक्ति अर्जित करना –
मुनिश्री ने कहा कि ब्रह्मचर्य केवल किसी वस्तु को छोड़ देने का नाम नहीं है। ब्रह्मचर्य का वास्तविक उद्देश्य अपनी शक्ति को जागृत और विकसित करना है।
उन्होंने साधकों से आत्मचिंतन का आह्वान करते हुए कहा कि प्रत्येक अनुभव के बाद स्वयं से पूछें — “इस अनुभव से मेरी कौन-सी शक्ति बढ़ी? मेरे ज्ञान में क्या वृद्धि हुई? मेरी सोच और चिंतन कितना मजबूत हुआ? क्या मैं अपने बंधनों से थोड़ा और मुक्त हुआ?”
उन्होंने कहा कि यही सम्यक दृष्टि है। सम्यक ज्ञानी संसार में रहते हुए भी संसार में खोता नहीं है। वह प्रत्येक निमित्त और परिस्थिति को अपनी आत्मिक उन्नति का साधन बनाता है। जीवन में आने वाले निमित्तों से घबराना या उनसे भागना नहीं है, उन्हें पहचानकर अपनी सुप्त शक्ति को जागृत करना है। जहाँ दो तत्त्व मिलें, वहाँ शक्ति का निर्माण हो और जहाँ कोई अनुभव मिले, वहाँ आत्मिक कमाई हो — यही ब्रह्मचर्य की महान कला है।
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि धर्मसभा में प्रमुख रूप से चक्रवर्ती अध्यक्ष आनंद नवीन गोधा, चक्रवर्ती सपना मनीष गोधा, अशोक डोशी, हर्ष जैन, आकाश आलोक कोयला, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय जी पाटोदी, हुकुमचंद जैन काका, अक्षय जी कासलीवाल, धर्मेन्द्र जी जैन, गिरीश जी जैन गिन्नी, प्रदीप,पारस भैया जी ब्रह्मचारी, विनोद जी भैया, विजय धुर्रा डॉ जैनेन्द्र जैन सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी समाजजन उपस्थित रहे।