दूसरों को दिखाने और जलाने के लिए लिया गया कर्ज ,हमारे मन की शांति और चेहरे की प्रसन्ता को छीन लेता है – अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी

सम्मेदशिखर जी। अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी ने अपने मौन उवाच में सम्मेदशिखर जी के स्वर्णभद्र कूट से अपनी मौन साधनाये से बताए कि दूसरों को दिखाने और जलाने के लिए लिया गया कर्ज ,हमारे मन की शांति और चेहरे की प्रसन्ता को छीन लेता है ।
कर्ज का मर्ज बहुत खतरनाक होता है बाबू ।
आज घर परिवार ,समाज और देश में कर्ज लेने की प्रवृत्ति के बेशर्म के पेड़ की तरह फैल रही है। आज प्रत्येक व्यक्ति कुछ न कुछ ,कहीं ना कहीं ,किसी ना किसी का कर्जदार बनकर बैठा है। परिणामत: व्यक्ति की आय का बड़ा हिस्सा कर्ज उतारने में जा रहा है ।जिसकी वजह से घर, परिवार में अशांति,परेशानी, मानसिक तनाव और बीमारियां बढ़ रही है ।कर्ज के बहुत से व्यक्ति भीतर ही भीतर घुटन महसूस कर रहा है ।कर्ज इंसान को चिंताग्रस्त कर रहा है ।मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन कर्ज ही है। कर्जदारवव्यक्ति हर समय इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि कर्ज कैसे चुकाऊंगा ?
कर्ज लेने में अच्छा लगता है देने में तारे जमी पर दिख जाते हैं ।वो घर परिवार कभी स्वतंत्र और आत्मनिर्भरता का जीवन नहीं जी सकता, जो उधार पैसा और ऋण लेकर जी रहा हो।ऋण लेना जिनका सरल है उतना ही वापस करना दुष्कर है ।इसलिए आयुर्वेद ने कर्ज को रोग की संज्ञा दी है। जिसको समय रहते नहीं चुकाया यो वह एक लाइलाज बीमारी बन सकता है ।आज कर्ज लेना फैशन बन गया है वास्तव में कर्ज लेना मजबूरी नहीं ,सिर्फ एक आदत का परिणाम है । सुख, शांति, प्रेम का जीवन जीने के लिए दो सुखी रोटी और कच्चे मकान में गुजारा कर लेना लेकिन कर्ज लेकर झूठी शान शौकत से बचना चाइये । उक्त जानकारी कोडरमा मीडिया जैन राज कुमार अजमेरा ने दी ।

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