उपाध्याय प्रवर , स्वहृदय कवि, प्रसिद्धवक्ता, वाणी भूषण, धर्म भूषण, समय के प्रहरी, शताब्दी नायक पूज्य श्री मूलचंद जी महाराज साहब के प्रथम पुण्य स्मृति दिवस पर कोटिश: वंदन, नमन एवम श्रद्धासुमन

लेखक – सुरेन्द्र मारू इंदौर
मो. 98260-26001

म्हारो नाम मूलियो ने मुं भूलियो
वो ऐसे थे फरिश्ते, खुद तन भी कष्ट झेले।
सब को दिखाएं रस्ते, वो ऐसे थे फरिश्ते।।
थी धन्य माता ऐसी, और धन्य थे पिता वो।
दिया ऐसा फूल जिस पर, नाज है गुलिस्तां को।।
सदियों तक जमाना, उनका ही नाम लेगा।
वो ऐसे थे फरिश्ते, खुद तन भी कष्ट झेले।।
जय हो, जय हो, जय हो, गुरु मूल गुरु की।
जय हो, जय हो, जय हो, गुरु मूल मुनि की।।
उपाध्याय श्री मूल मुनि जी महाराज साहब का जन्म – अश्विन शुक्ल पंचमी संवत 1979 पाली, मारवाड़ (राज.) में पिताश्री सेठ श्री बस्तीमलजी गादिया के घर आंगन एवं मातुश्री श्रीमती भीखी बाई की रत्न कुक्षी से हुआ। बालक का नाम मूलचंद रखा गया। बालक धीरे धीरे बड़ा होने लगा। विधि के विधान देखिए का अचानक जब आपकी आयु मात्र 9 वर्ष की थी तब आपकी मातुश्री श्रीमती भीखी बाई तथा कुछ ही अंतराल में आपके भाई-बहन का स्वर्गवास हो गया। बालक मूलचंद कुछ समझपाता की तीन वर्ष पश्चात ही आपके पिताश्री का भी स्वर्गवास हो गया। बालक मूलचंद पर यह भयंकर वज्रपात था। मासूम, मायूस बचपन ने इस कुठाराघात को कैसे सहन किया होगा? इसकी कल्पना मात्र से दिल द्रवित हो जाता है।
अध्ययन के लिए 5 वर्ष तक आप गुरुकुल में भी रहे, जहां शिक्षा और संस्कृति के संस्कार पल्लवित हुए। अपने बचपन के मित्रों के बीच आप मूलिया नाम से प्रसिद्ध हो गए और बड़े ही मस्ती के अंदाज में आप कहा करते थे कि – म्हारो नाम मूलियो ने मुं भूलियो और सब मित्र जोर से ठहाका लगाते।
पाली में मुनि श्री कन्हैया – लाल जी महाराज के व्याख्यान में श्री जैन दिवाकर जी महाराज साहब रचित जम्बूकुमार चरित्र सुना तो सांसारिक क्रिया कलापों – भोगों से विरक्ति हो गई। विक्रम संवत 1997 का वर्षावास जैन दिवाकर जी महाराज का जोधपुर में था। उस वर्षावास में श्री मूलचंद जी सहित पांच किशोर जैन दिवाकरजी म. के दर्शनार्थ गए। वहां जैन दिवाकरजी म.सा. ने सहज ही उनसे पूछा – दीक्षा कौन लेगा? मूलचंदजी ने तुरंत स्वीकृति सूचक हाथ खड़ा कर दिया। 17 वर्ष की यौवनावस्था में मूलचंदजी ने विक्रम संवत 1997 फाल्गुन कृष्ण पंचमी (03.03.1941) को समदड़ी (मारवाड़) राजस्थान में जैन दिवाकर जी महाराज से भागवती दीक्षा अंगीकार कर ली। दीक्षा के 2 वर्ष पश्चात आपने प्रति रविवार आयम्बिल तप की आराधना शुरू कर दी करीब 79 वर्षों से आपकी यह मंगल तप आराधना अनवरत जारी रही जो एक कीर्तिमान है।
श्री जैन दिवाकर जी महाराज के सानिध्य में श्री मूल मुनि जी 10 वर्ष तक रहे और उनकी चरण सेवा में रहते हुए उनसे जीवन, जगत और साधना के बारे में अनेकानेक बातें सीखी।
उपाध्याय, करुणा के सागर, ज्योतिषाचार्य पूज्य श्री कस्तूर – चंदजी महाराज के सानिध्य में 14 वर्ष तक रहे और उनके साथ मुनि श्री ने निम्न मध्यम वर्ग के लोगों के कई प्रकार के कष्टों का अनुभव किया। श्री मूलचंद जी महाराज का कहना था कि- श्री कस्तूरचंदजी महाराज ने उनमें करुणा के विशेष भाव भरे। अपने से छोटों को सम्मान देना भी उन्होंने उपाध्याय श्री कस्तूरचंदजी महाराज सा. से सीखा।
इसी तरह पूज्य श्री श्रीलाल जी म., पूज्य श्री मन्नालालजी म. सा., पूज्य श्री खूबचंद जी म.सा., पूज्य श्री शेषमलजी म.सा., पूज्य आचार्य श्री आत्मारामजी म.सा., पूज्य आचार्य श्री आनंद ऋषिजी म.सा., पूज्य आचार्य श्री देवेंद्र मुनि जी म.सा., पूज्य आचार्य श्री शिव मुनि जी म.सा. के मार्ग दर्शन में जिनशासन की शान बढ़ाने का कार्य किया। इतने आचार्यों के साथ कार्य करने का भी एक कीर्तिमान बनाया। वे चलते फिरते पुस्तकालय थे । सैकड़ों वर्षों में ऐसे शताब्दी पुरुष होते है।
आप के प्रवचन अत्यंत ही प्रेरणास्पद प्रभावी सरल सहज एवं गहरे भाव लिए होते थे। यह कहना अतिशयोक्ति पूर्ण नहीं होगा की प्रसिद्ध वक्ता जैन दिवाकर श्री चौथमलजी महाराज का यह प्रशिष्य भी प्रसिद्धवक्ता और वाणी – भूषण के रूप में प्रतिष्ठित था। आपके प्रवचनो में साहित्य के नवरस विद्यमान होते थे, हर विषय का समावेश उनमें रहता था। आपके प्रवचनो में विशेष रूप से मानवता, एकता, प्रेम, करुणा, स्वाध्याय, शील, क्षमा समता इत्यादि पर विशेष जोर रहता था। आप कहा करते थे कि- हमें एकता का श्री गणेश अपने परिवार से करना चाहिए। प्रेम से मिलजुल कर रहे हैं। अप्रिय एवं आवेशपूर्ण भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
उपाध्याय श्री मूल मुनि जी महाराज साहब गद्य तथा पद्य के अच्छे रचनाकार थे। दो दर्जन से भी अधिक आपकी साहित्यिक कृतियां रही है ,जो आपके साहित्यिक प्रतिभा का प्रमाण है। आपके द्वारा रचित चरित काव्य भी वर्षावास के दौरान संत- सतियों के द्वारा धारावाहिक रूप से व्याख्यान में पढ़े व सुनाए जाते हैं। आचार्य श्री देवेंद्र मुनि जी के शब्दों में- मुनि प्रवर श्री मूल मुनि जी की कविता में अपूर्व लालित्य है। आप प्राकृत, हिंदी, राजस्थानी, मारवाड़ी, मराठी आदि कई भाषाओं के ज्ञाता रहे एवम जैन आगम एवं जैनेतर धर्म-दर्शन का अध्ययन किया।
मूलचंद जी महाराज साहब ने संघ में कभी भी पद प्राप्ति की चाह नहीं की। श्रमण संघ में उपाध्याय पद पर आपकी नियुक्ति का प्रश्न आया तो आपने स्पष्ट इंकार कर दिया। किंतु आपकी विद्वता और प्रभावकता को देखते हुए प्रवर्तक श्री रूपचंदजी म.सा.
रजत की सलाह से आचार्य श्री देवेंद्र मुनि जी ने आषाढ़ शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत 2050 (24.06.1993) आपको श्रमण संघ के उपाध्याय पद पर नियुक्त किया। श्रीसंघ केकड़ी (अजमेर) राजस्थान ने मुनि श्री को धर्म भूषण के विरद से तथा सन् 2004 में उदयपुर वर्षावास में वर्धमान श्रावक संघ, श्राविका संघ, और युवक परिषद की ओर से एक विशाल समारोह में राजस्थान के गृहमंत्री श्री गुलाबचंद जी कटारिया ने समय के प्रहरी जैसे अर्थ पूर्ण अलंकरण से विभूषित कर अभिनंदन किया था। आपके दीक्षा गुरु मनोहर व्याख्यानी प्रवर्तक श्री वृद्धि चंद जी महाराज साहब थे। विविध विधाओं में विरचित उपाध्याय श्री मूलचंदजी महाराज का साहित्य – काव्य चरित्र- समरादित्य चरित्र, कुवलयमाला चरित्र, व्यवहारी, रतनकुमार चरित्र, अजापुत्र चरित्र, अभयरुचि- अभयमति चरित्र, वीर अम्बड़ चरित्र, कयवन्ना चरित्र, उदायन चरित्र – 1, महाबल- मलियासुंदरी चरित्र, कनक सुंदरी चरित्र, उदयन चरित्र – 2 भगवान शांतिनाथ चरित्र, विक्रम चरित्र। पद्य- अपना खेल – अपनी मुक्ति। गीत- पथिक के गीत, विमल गीतांजली गद्य- हमें लखा नहीं कोय (विविध सत्य घटनाओं का विश्लेषणात्मक संकलन) 81- वर्ष का विशाल संयम जीवन का भी आप कीर्तिमान बना गए। ज्योतिष के प्रकांड विद्वान, इतिहास विज्ञ, वरिष्ठ संत के तप संयम की तरंगों से उनके चरणों में आकर जो मांगलिक सुन लेता वह तीर जाता था। उन्होंने संयम केआनंद को लुटा,आनंद को बांटा । डॉक्टर, दवाइयों की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं पड़ी मात्र 15 दिन बीमार रहे। अंतिम समय और 26 सितंबर 2021 को प्रात: काल की वेला 5.35 पर आप संथारे के साथ (संथारा जो कि 14.15 घंटे का रहा पूर्ण होशो हवास में पूर्व संध्या दो. 3.15 पर करवाया गया) आप इस संसार को छोड़ दूसरे भव की यात्रा की और अग्रसर हो गए और इस तरह शताब्दी नायक अपनी मृत्यु को भी महोत्सव बना गए । आप जहां भी रहे आपकी कृपा जिनशासन और उसके भक्तों पर अनवरत बरसती रहे,बरसती रहे,…..। प्रथम पुण्य स्मृति पर सादर.. वंदन , नमन, श्रद्धासुमन ………….,

Play sound