दवाइयों पर बेहिसाब मुनाफा, सभी पेशेंट भुगत रहे हैं

दवाइयां चाहे एलोपैथी, होम्योपैथी या आयुर्वेदिक हो इन दिनों दवाइयां की कीमतें बेहिसाब बढ़ चुकी है। जिसका प्रमुख कारण मुनाफा। एक सर्वे अनुसार ताकत बढ़ाने की कैप्सूल की निर्माण लागत करीब 8 ₹ से ₹10 आती है और वह होलसेलर के पास ₹15 में बिकती है होल्सेलर से डिस्ट्रीब्यूटर के पास ₹22 मैं बिकती है डिस्ट्रीब्यूटर से रिटेल स्टोर के पास ₹30 में में बिकती है और रिटेल स्टोर वाले अपने अनुसार डिस्काउंट देकर उस दवाई को बेचते हैं जिसकी ₹70 की एमआरपी लिखी होती है। दवाई की अच्छी मार्केटिंग होने पर डिस्काउंट के बजाय एमआरपी पर ही बेची जाती है। कई विदेशी कंपनी की दवाई तीन चार सौ पर्सेंट मुनाफा ज्यादा जोड़कर बेची जाती है उसमें से डॉक्टर जो दवाई लिखते हैं उनको अच्छा खासा कमीशन, फॉरेन टूर और भी कई प्रलोभन दिये जाते हैं। दवाई का मैन्युफैक्चरर्स को जितनी कमाई नहीं होती है उससे ज्यादा कमाई रिटेल स्टोर वालों को होती है। अस्पतालों में जो दवाई की दुकान है वह कोई डिस्काउंट नहीं देते एमआरपी पर ही दवाई देते हैं।
हाल फिलहाल में भारत के आयुर्वेदिक दवाइयों का एक्सपोर्ट करीब 40 परसेंट बढ़ चुका है और आयुर्वेदिक दवाइयाॅ 200-400 परसेंट मुनाफे के साथ बिकने लगी। बढ़ती जनसंख्या और मौसम की गड़बड़ी के कारण मरीजों की संख्या करीब-करीब 60 -70 परसेंट हो गई, दवाइयों की आवश्यकता भी बढ़ गई। आप सोच लीजिए कि कितनी बड़ी धनराशि दवाईयो पर खर्च होती है।
सरकार कोशिश करती है कि जेनेटिक दवाइयां लिखी जाए जोकि कम मुनाफे पर बेची जाती है पर बड़ी कंपनी द्वारा दवाई बनाने वाले अपनी मार्केटिंग इस ढंग से करते हैं कि जेनेटिक दवा दब जाती है।
अशोक मेहता, इंदौर (लेखक, पत्रकार, पर्यावरणविद्)

Play sound