धर्म के रूप अनेक हो सकते हैं प्रभाव शुद्ध होना चाहिए तो ही मोक्ष की प्राप्ति है-शासन दीपक आदित्य मुनि म सा

रतलाम। राम महिमा महोत्सव के अंतर्गत शासन दीपक आदित्य मुनि जी ने प्रवचन में फरमाया की उत्तरा ध्यान सूत्र के अनुसार संयोग से विप्र मुक्त होना ही मोह का त्याग है क्योंकि धर्म करने के भिन्न प्रकार हैं साधना, सामायिक ,मंदिर ,मूर्ति ,सेवा, आदि परंतु आप उसे शुद्ध भावना से कर रहे हैं कि नहीं यह महत्व रखता है शुभ कार्य करते हुए भी भावना अगर अशुद्ध है तो हमारा लक्ष्य पाना मुश्किल है मोक्ष गति की प्राप्ति शुद्ध भाव से की जा सकती है क्रोध, मान, माया, लोभ ,राग, द्वेष ,कलह अगर मन को विचलित कर रहे हैं तो हम प्रभु आराधना में कितने भी लीन हो जाएं हम उचे नहीं उठ सकते। क्रिया अभी क्या कर रहे हैं इसका महत्व नहीं है किन भाव के साथ कर रहे हैं उसका महत्व है कर्म बंधन भी दो प्रकार के होते हैं गाडा बंधन व हल्का बंधन, मृत्यु भी निश्चित है परंतु हमें नहीं पता कि मृत्यु के बाद किस भाव में जाएंगे उदाहरण देते हुए फरमाया कि टाइटेनिक पर भी लिखा हुआ था नहीं डूबने वाला जहाज वह भी डूब गया तो हम अजर अमर नहीं है इसलिए समय को व्यर्थ ना करते हुए अपने भावों को संयमित करें और शुद्ध भाव से मुंह में ना पढ़ते हुए आसक्ति की ओर चले। उपरोक्त जानकारी देते हुए साधुमार्गी जैन संघ के प्रीतेश गादिया ने बताया कि चरित्र आत्माओं की निश्रा में कई भाई बहनों की त्याग तपस्या चल रही है इस अवसर पर श्री संघ के अध्यक्ष सुदर्शन जी पीरोदिया अपने भाव रखें व संचालन मंत्री दशरथ बाफना ने किया।