नवकार भवन में चातुर्मासिक प्रवचन
रतलाम, 11 जुलाई। लुकमान हकीम सारी बिमारियों का उपचार कर देता था, लेकिन अहम और वहम का इलाज उसके पास नहीं था। आज विज्ञान के इतनी प्रगति करने के बाद भी ऐसी औषधि नहीं बनी, जो अहम और वहम का इलाज कर सके। ये बिमारी निर्बल मन में होती है, इससे बचने के लिए मन को पावरफुल बनाओ।
यह बात परम पूज्य प्रज्ञा निधि युगपुरूष आचार्य प्रवर 1008 श्री विजयराजजी मसा ने कही। सिलावटों का वास स्थित नवकार भवन में प्रवचन के दौरान दुर्मति के तीसरे दोष संदेहशीलता पर प्रकाश डालते हुए उन्होने कहा कि कि संदेह अविश्वास की धरा पर पैदा होता है और हमेशा तनाव बढाता है। संसार में आज जितने भी तनाव है, वे संदेह के कारण ही है। इससे बचाव के लिए सबकों जो होता है, वह अच्छे के लिए होता है और जो होगा, वह भी अच्छे के लिए होगा का भाव रखना चाहिए। आचार्यश्री ने कहा कि जिसका मन पावरफुल होता है, उसे संसार में कोई हरा नहीं सकता और यदि मन कमजोर होगा, तो कोई जीता नहीं सकता है। मन को सबल बनाने के लिए अहम और वहम से बचना जरूरी हैं
आचार्यश्री ने बताया कि कई लोगों को वहम होता है कि अमुख तिथि अथवा वार पर घर से नहीं निकलना चाहिए, जबकि कई लोग कहते है कि जन्म पत्रिका नहीं मिलती, तो दामपत्य जीवन सफल नहीं होता। लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ नहीं है। जीवन में यदि सुख-शांति चाहिए तो अपने भाग्य पर भरोसा करके पुरूषार्थ करना चाहिए। निर्मल मन से किया गया पुरूषार्थ अच्छे परिणाम लाता है, लेकिन यदि मन निर्बल हुआ तो व्यक्ति हार जाएगा। संदेह की चार प्रवत्तियां-होगा कि नहीं होगा? कब होगा? कैसे होगा? क्या होगा? है। इनमें पडने के बजाए यदि जो होगा, वह अच्छा होगा और जो हुआ, वह अच्छे के लिए हुआ का चिंतन करेंगे, तो मन सबल होगा और उसमें निर्मलता आएगी। निर्मल मन ही सन्मति से सदगति की और ले जाएगा।
प्रवचन में उपाध्याय, प्रज्ञारत्न श्री जितेशमुनिजी मसा ने आहार के प्रकार और उनके परिणाम विस्तार से समझाए। विद्वान सेवारत्न श्री रत्नेश मुनिजी मसा ने भी संबोधित किया। आदर्श संयमरत्न श्री विशालप्रिय मुनिजी मसा ने प्रवचन पर आधारित रोचक प्रश्न किए। संचालन हर्षित कांठेड द्वारा किया गया।