कोयले की खान से भी निकलते है हीरे, भूलकर भी नहीं रखे पूर्वाग्रह- दर्शनप्रभाजी म.सा.

  • ज्ञान को नष्ट कर देता अभिमान, कर्मसत्ता पर चलता केवल धर्मसत्ता का जोर
  • रूप रजत विहार में महासाध्वी इन्दुप्रभाजी के सानिध्य में चातुर्मासिक प्रवचन

भीलवाड़ा, 9 अगस्त। विचार ओर दिल एक-दूसरे के पूरक है। विचार जितने निम्न स्तर के होंगे दिल भी उतना ही छोटा होता जाएगा। इसी तरह तरह दिल छोटा हुआ तो विचार भी संर्कीण जाएंगे। हमारी संस्कृति सिखाती है विचार ओर दिल हमेशा बड़े रखने चाहिए। कभी भी ये पूर्वाग्रह नहीं रखना चाहिए कि निम्न वर्ग या स्तर का व्यक्ति अयोग्य ही होगा ओर उच्च कुल में जन्म लेने मात्र से व्यक्ति योग्य होगा। हमेशा याद रखना चाहिए कि कोयले की खान से ही हीरे निकलते है। ये विचार भीलवाड़ा के चन्द्रशेखर आजादनगर स्थित रूप रजत विहार में बुधवार को मरूधरा मणि महासाध्वी श्रीजैनमतिजी म.सा. की सुशिष्या महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. के सानिध्य में आयोजित चातुर्मासिक धर्मसभा में मधुर व्याख्यानी डॉ. दर्शनप्रभाजी म.सा. ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कर्मफल से कोई नहीं बचा सकता है। कर्म काटने के लिए आपकी संपदा नहीं धर्म ही काम आएगा। कर्मसत्ता पर केवल धर्मसत्ता का ही जोर चल सकता है। आजकल हालात ये है कि व्यक्ति को तन गोरा व कपड़े ब्राण्डेड चाहिए भले उसके विचार व व्यवहार ब्राण्डेड नहीं हो। साध्वीश्री ने कहा कि तप व संयम कर्म क्षय करने का माध्यम है। ज्ञान का अभिमान कभी नहीं करना चाहिए। अभिमान ज्ञान को नष्ट कर देता है इसलिए ज्ञान के साथ विवेक को भी जोड़ना चाहिए। उन्होंने एकलव्य की द्रोणाचार्य के प्रति गुरूभक्ति प्रसंग की चर्चा करते हुए कहा कि जिसके जीवन में गुरू की बंदगी नहीं होती है उसका जीवन निर्मल नहीं हो सकता। आर्य संस्कृति तिरस्कार करने वाले का भी सम्मान करना सिखाती है। धर्मसभा में महासाध्वी इन्दुप्रभाजी म.सा. ने क्रोध से बचने की नसीहत देते हुए कहा कि सब चीजों को नापा जा सकता है पर क्रोध को नापने की कोई मशीन आज तक नहीं बन पाई है। क्रोध में व्यक्ति गलत कदम उठा लेता है। उन्होंने जैन रामायण का वाचन करते हुए बताया कि किस तरह अंजना को उसकी सास केतुमति चरित्र पर लांछन लगाते हुए सताती है ओर ये मानने को तैयार ही नहीं होती है कि उसका पुत्र महल में आया था। धर्मसभा में आगम मर्मज्ञा डॉ. चेतनाश्रीजी म.सा., तत्वचिंतिका डॉ. समीक्षाप्रभाजी म.सा.,आदर्श सेवाभावी दीप्तिप्रभाजी म.सा. एवं तरूण तपस्वी साध्वी हिरलप्रभाजी म.सा. का भी सानिध्य रहा। समारोह में पाली, जोबनेर, चैन्नई, मारवाड़, सरवाड़ आदि स्थानों के साथ भीलवाड़ा शहर के विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में पधारे श्रावक-श्राविका मौजूद थे। अतिथियों का स्वागत श्री अरिहन्त विकास समिति द्वारा किया गया। धर्मसभा का संचालन युवक मण्डल के मंत्री गौरव तातेड़ ने किया। चातुर्मासिक नियमित प्रवचन प्रतिदिन सुबह 8.45 बजे से 10 बजे तक हो रहे है। प्रतिदिन सूर्योदय के समय प्रार्थना का आयोजन हो रहा है। प्रतिदिन दोपहर 2 से 3 बजे तक नवकार महामंत्र जाप हो रहा है।
जैन दिवाकर चौथमलजी म.सा. से मिली प्रेरणा की 50 वर्ष से हो रही पालना
साध्वी दर्शनप्रभाजी म.सा. ने पर्युषण पर्व के दौरान पिछले 50 वर्ष से अधिक समय से पाली में आठो दिन बूचडखाने बंद रहने की परम्परा की चर्चा करते हुए कहा कि इसके लिए प्रेरणा पूज्य जैन दिवाकर चौथमलजी म.सा. से प्राप्त हुई थी। उनकी प्रेरणा पर पाली का जैन समाज आज भी अमल कर रहा है चाहे कितना भी खर्च करना पड़े लेकिन यह सुनिश्चित करता है कि आठ दिन कोई भी बूचडखाना नहीं खुल पाए। उन्होंने कहा कि हर दृष्टि से सक्षम जैन समाज को जीव दया के लिए इससे प्रेरणा लेकर सभी जगह ऐसा हो इसका प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूज्य चौथमलजी म.सा. के साथ जैन समाज के विभिन्न संत-साध्वियों ने भी पशु बलि बंद कराने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में प्रेरणादायी कार्य किए है।
जाति नहीं कर्म से बनता व्यक्ति महान
साध्वी दर्शनप्रभाजी म.सा. ने हरिकेषमुनि के प्रसंग की चर्चा करते हुए कहा कि कोई भी कभी जाति से महान नहीं होता है। हमारा जन्म भले नीच कुल में हो पर विचार उच्च हो तो जीवन सार्थक हो जाएगा। इंसान जाति नहीं कर्म से महान बनता है। इसलिए सदैव अपने कर्म उच्चकोटि के होने चाहिए। यदि जैन कुल में जन्म लेकर भी पाप कार्य में जुटे रहते है तो जीवन सार्थक नहीं होगा। व्यक्ति से जाति के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर भेद करना चाहिए।
तपस्वियों के पारणे की अनुमोदना
नवदीक्षिता तरूण तपस्वी साध्वी हिरलप्रभाजी म.सा. के प्रथम बार नौ उपवास की तपस्या एवं चातुर्मास आयोजक श्री अरिहन्त विकास समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र सुकलेचा के अठाई तप की साधना पूर्ण होने पर बुधवार को पारणे की अनुमोदना की गई। सभी ने सआनंद पारणा सम्पन्न होने ओर सुखद स्वास्थ्य की कामना की। दर्शनप्रभाजी म.सा. ने कहा कि तप आत्मशुद्धि के लिए किया जाता है। देवता भी तप साधना नहीं कर सकते है तो वह भी तपस्या की अनुमोदना करते है ओर तपस्वियों के लिए समोवशरण का निर्माण करते है। हमारे जीवन में त्याग ओर तप की भावना सदा रहनी चाहिए। भूख से कम खाना भी बड़ी तपस्या समान है। उन्होंने बताया कि कई बच्चें 15 दिवसीय द्रव्य मर्यादा तप (चन्द्रकला तप) कर रहे है जिसका बुधवार को 11वे दिन है ओर 15 से घटते हुए पांच द्रव्य की मर्यादा तक आ गए है। इसी तरह लोगस्स का मासखमण भी कई श्राविकाएं कर रही हैं।
सामूहिक आयम्बिल आराधना 17 अगस्त को
श्रमण संघीय आचार्य सम्राट आनंदऋषिजी म.सा. की जयंति पर 17 अगस्त को देश में एक लाख आठ हजार आयम्बिल तप आराधना में भीलवाड़ा के रूप रजत विहार से भी अधिकाधिक सहभागिता हो इसके लिए साध्वीमण्डल निरन्तर प्रेरणा प्रदान कर रहा है। इस दिन हर घर से कम से कम एक आयम्बिल अवश्य हो इसके लिए प्रेरणा प्रदान की जा रही है। सामूहिक आयम्बिल की व्यवस्था श्रीसंघ द्वारा की जाएगी। चातुर्मास में मरूधर केसरी मिश्रीमलजी म.सा. की 133वीं जयंति एवं एवं लोकमान्य संत शेरे राजस्थान रूपचंदजी म.सा. की 96वीं जयंति के उपलक्ष्य में 24 से 26 अगस्त तक सामूहिक तेला तप साधना होगी।