जलगांव । सर्वप्रथम अतंगड़ सूत्र का वाचन, आज पर्युवषण पर्व के तीसरे हुआ । उसके बाद उप प्रबवर्तक परमपूज्य अक्षयऋषिजी महाराज साहब ने गुस्से (क्रोध) के विषय पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने गुस्से को कम करने के लिए गुरूवर्य परमपूज्य आनंदऋषि महाराज साहब का उदाहरण दिया । वे श्रावकों को सुनने वालों को एक घंटे तक गुस्सा नहीं करेंगे, ऐसे प्रत्याख्यान देते थे ।
कांताई गुरू उपाश्रय दादावाड़ी में श्रमण संघीय युवाचार्य प्रवर पं.पू. महेन्द्रऋषिजी मसा ने अपने व्याख्यान के विषय ”तू ही बाती तू ही ज्योतÓÓ के बारे में अपने प्रवचन में उन्होंने अपने अन्य पर्वो की तुलना में पयुर्षण पर्व की विशेषताओं का वर्णन किया। परम पूज्य तिलोकऋषिजी मसा की एक कविता द्वारा समझाया । उन्होंने कहा कि पर्युषण पर्व एक महत्वपूर्ण त्यौहार है जो धार्मिक भावनाओं को जागृत करने वाला है । यह एक ऐसा त्यौहार है जो धर्म आराधना करवाता है और आतंरिक चेतना को प्रोत्साहित करता है । ”तू ही बाती तू ही ज्योतÓÓ के अन्तर्गत बात या बाती यानी शरीर और ज्योत यानी आत्म तत्व का सूचक है । चेतना और आत्मा अनादिकाल से सम्बंधित है । नश्वर शरीर का मूल्य तब तक है जब तक आत्म तत्व है । आत्मा के आस्तित्व का अनुभव बहुत महत्वपूर्ण है । आत्मा की ज्योति को प्रकट करने के लिए आत्मा के प्रकाश का अनुभव करना आवश्यक है । भगवान ऋषभदेव ने अपने ९८ पुत्रों को ज्ञन की शिक्षा देते हुए, भौतिक जगत की अमरता और अलगाव की व्याख्या समझाई थी। राज्य वैभव और स्वर्गीय सुखों को अनुभव करने के बाद भी भौतिक सुखों को छोडऩा पड़ता है । केवल आत्म महिमा और आत्मा का राज्य ही शाश्वत है । उन ९८ राजकुमारों ने सहमति व्यक्त की और भौतिक दुनिया को छोड़कर आत्म साक्षात्कार के मार्ग पर चल पड़े । ऐसा करने के लिए आपके पास मजबूत आत्म विश्वास हना चाहिए । चार प्रकार के व्यक्तियों पर चर्चा की, जिनके पा ऐसा आत्मविश्वास नहीं है । मटक, चटक, खिचडिय़ा, मसानिया, इन चार जनं का उल्लेख तिलोकऋषिजी इन्होंने किया । मटक यानी त्यौहार वरैगेरह आते तभी धर्मध्यान, आराधना करने का जिन्हें स्मरण होता । चटक यानी दुख के प्रंसग पर धर्मध्यान करने वाला । खिचडिय़ाँ मतलब अपनी भौतिक इच्छाएं पूर्ण करने हेतु आराधना करने वाला । चौथा प्रकार मसानिया, उन्हें बस शमशान तक का वैराग्य होता है । ऐसी व्यक्ति आत्मज्योत प्रकट नहीं कर सकती है । आत्मज्योति को प्रकट करने के लिए गजसुकुमाल इनका उदाहरण दिया । गजसुकुमाल इन्होंने अध्यात्म वैभव प्राप्त करने के लिए राजवैभव छोड़ा । गजसुकुमल मुनि ने भौतिकवाद का पिंजरा छोड़ दिया और आत्म साधना के लिए चले गए । उनकी मां ने उसे सिखाया कि वह लक्ष्य हासिल करने के लिए पहले रूकना नहीं चाहिए । जिसके लिए आप सन्यास का मार्ग स्वीकार कर रहे है । इस व्रत को मजबूती से आगे बढ़ाए । देवकी माता ने गजसुकुमाल को क्या उत्तम और आदर्श सीख दी । यह बेहतर होगा अगर आज की माताएं इस आदर्श को अपने सम्मुख रखे और अपनी बेटियाँ और बेटों को अच्छे संस्कार दे। दूसरी और यदि एक विवाहित लड़की क ोपहले ही दिन अपनी मां यदि बोलती है और उसे स्थिति के अनुकूल व्यवहार और मन को मजबूत रहने की सीख देती है तो उसका जीवन सुख और आदर्शवत हो सकता है । वास्तव में इससे कोई फर्ख नहीं पड़ता कि वरिष्ठ नागरिकों से कितनी सम्पत्ति मिलेगी, अपितु बड़ो द्वारा दी गई शिक्षाएँ, दिए गए संस्कार, पीठ पर थपथपाना बहुत महत्वपूर्ण है ।
अपने आत्मविश्वास के साथ-साथ, मृत्युसम यातना के समय गजसुकुमल इनको माँ की शिक्षाएँ दी उपयोगी सिद्ध हुई थी । सोमिल ने उनके सिर पर गर्म मिट्टी डालकर उसमें गर्म लपटें डाल दी थी । इस कष्टदायी दर्द के बीच भी गजसुकुमाल ने बिना किसी दुश्मनी के दर्द का स्वीकार किया । यह उनके अंतरंग में शरीर एवं आत्मा भिन्न होने की उनकी अपनी समझ, वह विश्वास तथा आत्मज्योति प्रकट होने के कारण ही संभव हुआ तो आइए हम भी आत्म ज्योति प्रज्जवलित करने का प्रयास पर्युषण पर्व में करते है ।